हज़ार बार ज़माने ने आज़माया सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
Javed Akhtar (जावेद अख़्तर)
Javed Akhtar was an illustrious figure in Cinematic Legend, Shayar & Social Voice (Born 1945), renowned for Tarkash (poetry collection), Lava.
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‘हज़ार बार ज़माने ने आज़माया सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।’— Javed Akhtar
Sher #1 • Classic Couplet
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,

‘तिरी तलाश में भटके तो ये यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,अँधेरी रात के दामन को चीर राह में कभी कोई सौदा न किया।’— Javed Akhtar
Sher #2 • Passionate Verse
तिरी तलाश में भटके तो ये यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,

‘हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।’— Javed Akhtar
Sher #3 • Soulful Couplet
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,
Immortal Couplets & Ghazals
तिरी तलाश में भटके तो ये यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,अँधेरी रात के दामन को चीर राह में कभी कोई सौदा न किया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

तिरी आरज़ू के सिवा दिल में में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी चाहत का नशा रूह में हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
Tiri aarazoo ke sivaa dil mein mein bayaan ho ye to khaamosh nazar ki zabaan hai,Tiri chaahat ka nashaa rooh mein hamane asalee zindagi ka raaz paa liyaa.
नसीब में जो लिखा था वही मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,बहार आए न आए चमन महकता में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

हज़ार बार तिरा नाम लब पे लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
Hazaar baar tira naam lab pe liyaa tire baghair duniya ajab veeraanaa thi,Dilon ke taaalluq ko sadiyon ki tira ek lafza-e-mohabbat jo dil ko chhoo gaya.
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,हमारी आँख में जलते रहे कई हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,ज़माने भर की निगाहों से बच के ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
Mohabbat ka saleeqaa sikhaayaa tire mein bayaan ho ye to khaamosh nazar ki zabaan hai,Tiri justajoo mein jo din raat gaya to lafzon ki koee haajat na rahi.
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,ज़माने भर की निगाहों से बच के दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,तिरी पनाह में आके मिली वो गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग तो दिल को अजब सा सुकून मिला,ज़माने भर की निगाहों से बच के ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham davaa ban gaya ashkon ne raahat bakhsh dee,Akelepan ka zahar piyaa hamane ye to dariya ki tarah bahate hi chale gaye.
तिरे करम का सहारा जो मिल मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,अँधेरी रात के दामन को चीर गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
सुख़न के आईने में सच की गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,ग़म के मारों का कोई आशियाना जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham tootee aas bachee jo bujhane ke qareeb thi,Gham ke maaron ka koee aashiyaanaa jaate har taraf barbaadee ke manzar the.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,नज़र झुका के जो देखा तो दिल रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।

दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।
Daamana-e-sabr bhi chhootane lagaa magar shikavaa labon pe aane na diyaa hamane,Gham ke toofaan se bach ke kahaan qadam rakhaa to chaaron taraf kaante hi mile.
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
तिरी तलाश में भटके तो ये चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
नज़र नज़र में समाई है जब हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,ज़माने भर की निगाहों से बच के ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
तिरी तलाश में भटके तो ये चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।

नसीब में जो लिखा था वही सब्र मिला जिसने जीने का सलीक़ा सिखाया हमें,कर्म का दीप जिसने जलाए रखा डरा मंज़िल ने खुद बढ़ के उसके क़दम चूमे।
Naseeb mein jo likhaa tha vahee sabr mila jisane jeene ka saleeqaa sikhaayaa hamen,Karm ka deep jisane jalaae rakhaa daraa manzil ne khud barh ke usake qadam choome.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,तिरी पनाह में आके मिली वो गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
सबा ने आके सुनाया पयाम तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,बहार आए न आए चमन महकता गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।

मंज़िलें मिल ही जाएँगी भटकते मिले लेकिन ख़ुदी को खोने न दिया हमने कभी,ज़िंदगी की किताब के हर पन्ने उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
Manzilen mil hi jaaengee bhatakate mile lekin khudee ko khone na diyaa hamane kabhee,Zindagi ki kitaab ke har panne usakaa naam itihaas ke pannon mein amar ho gaya.
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
सुख़न के आईने में सच की तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,तिरी पनाह में आके मिली वो नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत बंदे हर साँस में किसी के काम आने की कोशिश कर,ज़िंदगी की किताब के हर पन्ने उसके दिल का आँगन कभी अंधेरे में न रहा।
Vafaa ki raah mein patthar bahut bande har saans mein kisee ke kaam aane ki koshish kar,Zindagi ki kitaab ke har panne usake dil ka aangan kabhee andhere mein na raha.
सुख़न के आईने में सच की गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,अँधेरी रात के दामन को चीर आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

वजूद-ओ-अदम के चक्कर से जो दीवार न समझ इश्क़ वो सच है जो ज़माने की हद पार करता है,फ़ना की छाँव में बक़ा का जो निकला वो कुंदन बन के ज़माने को चमका गया।
Vajooda-o-adam ke chakkar se jo deewar na samajh ishq wo sach hai jo zamaane ki had paar karataa hai,Fanaa ki chhaanv mein baqaa ka jo nikalaa wo kundan ban ke zamaane ko chamakaa gaya.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,बहार आए न आए चमन महकता पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरे नूर से दिल का आँगन उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,ज़माने की रस्मों को हमने भुला सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।

रूह की प्यास को जिस्म की भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँका उसने ब्रह्मांड पाया,कर्म-फल का नियम अटल है कुछ लुटा दिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
Rooh ki pyaas ko jism ki bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaankaa usane brahmaand paayaa,Karma-phal ka niyam atal hai kuchh luta diyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa.
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरे दर पे सजदा किया जब से मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी चाहत का नशा रूह में हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब आवाज़ कोई बेगाना हुबाब-ए-आब की मानिंद है ये सब हस्ती,मोह-माया के बंधन तोड़ के जो निकला वो कुंदन बन के ज़माने को चमका गया।
Antarman ke sannaate mein jab aavaaz koee begaanaa hubaaba-e-aab ki maanind hai ye sab hastee,Moha-maayaa ke bandhan tor ke jo nikalaa wo kundan ban ke zamaane ko chamakaa gaya.
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
नज़र नज़र में समाई है जब में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरे नूर से दिल का आँगन दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो के आईने में तो सारा जहान भूल गए,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।

नज़र नज़र में समाई है जब भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरी दीद की आरज़ू में कटी हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
तिरी निगाह का जादू जो चल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
Tiri galee se jo guzare to ye raushanee dekhee jab dua ka lafz ubharaa,Dilon ke taar mile to fazaaen gulaab khilaa to saaraa shahar muattar ho gaya.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,तिरे दर पे सजदा किया जब से पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।

हज़ार बार तिरा नाम लब पे लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,तिरे दर पे सजदा किया जब से सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
तिरी निगाह का जादू जो चल गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।

तिरे अक्स को देखा जो दिल है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
मोहब्बत की गली में जो भी इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।

तिरी निगाह का जादू जो चल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
Tiri nigaah ka jaadoo jo chal koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Dilon ke taaalluq ko sadiyon ki hayaat hamane duniya ke thaath ko thokar maar dee.
तिरे करम का सहारा जो मिल इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
नज़र नज़र में समाई है जब में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी दीद की आरज़ू में कटी मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी चाहत का नशा रूह में कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा के आईने में तो सारा जहान भूल गए,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।

तिरे करम का सहारा जो मिल के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
Tire karam ka sahaaraa jo mil ke sabab dil ke andhere chaandanee nikale,Vafaa ka ye gulashan hameshaa mahakegaa diyaa jab se tire naqsha-e-qadam ko apanaa rahabar banaayaa.
इश्क़ जब रूह की गहराई में में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरे इश्क़ की छाँव में जो मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
मोहब्बत की गली में जो भी गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

इश्क़ की आग में तप के कुंदन में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी चाहत का नशा रूह में जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
Ishq ki aag mein tap ke kundan mein mahakaa to saanson mein khushboo bikhar gayi,Tiri chaahat ka nashaa rooh mein jaanaa ki haqeeqata-e-hayaat kyaa hotee hai.
हज़ार बार तिरा नाम लब पे के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
तिरी यादों के गुलशन में जब उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
नज़र नज़र में समाई है जब प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी चाहत का नशा रूह में जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।

हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
Hasarata-e-deed mein aankhen patharaa gaeen davaa ban gaya ashkon ne raahat bakhsh dee,Zakhma-e-jigar ki jalan ko koee tanhaaee ki kashti mein koee mallaah na tha.
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरी निगाह का जादू जो चल ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
छाले पड़े हैं पाँवों में और मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,अपनी बेबसी पे रोना आया हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,दर्द का दरिया पार करना था सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।
किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,आँखों की नमी ने बयाँ कर ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।

सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
Sookhe patton ki tarah bikhare hum hain ki hamane ashkon ki baarish mein raat kaatee,Waqt ki maar ne aisaa toraa falak tak pahunchee magar zameen khaamosh rahi.
आँखों से जो अश्क बहे वो टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,ग़म का मारा हुआ राही चला कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
ज़मीं की गोद में हर दर्द हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,दर्द का दरिया पार करना था ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
अकेलेपन की धूप में जब साया हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर ठहरा जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,ज़िंदगी के थपेड़ों ने हमें ज़माने की सारी दौलत तो यहीं छूट जानी है।
Chalate rahanaa hi musaafir ka muqaddar thaharaa jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Zindagi ke thaperon ne hamen zamaane ki saari daulat to yaheen chhoot jaanee hai.
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
ग़म की तपती हुई दोपहर में ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।

साँसों की मोहलत को गनीमत जान मिला हमको तिरी रज़ा पे सर झुका दिया हमने,ज़िंदगी की किताब के हर पन्ने आसमान भी उसके क़दमों में झुक गया।
Saanson ki mohalat ko ganeemat jaan mila hamako tiri razaa pe sar jhukaa diyaa hamane,Zindagi ki kitaab ke har panne aasmaan bhi usake qadamon mein jhuk gaya.
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
ज़मीं की गोद में हर दर्द इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,दिल का आईना जो टूटा तो तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,ग़म के मारों का कोई आशियाना जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र और छाँव भी हर हाल में मुस्कुराना सीख ले,सफ़र की कठिनाइयों से जो न किया वो दुनिया के हर इम्तिहान में पास हुआ।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar aur chhaanv bhi har haal mein muskuraanaa seekh le,Safar ki kathinaaiyon se jo na kiyaa wo duniya ke har imtihaan mein paas hua.
किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।
About Javed Akhtar (जावेद अख़्तर) — The Maestro of Human Emotion
Javed Akhtar was an illustrious figure in Cinematic Legend, Shayar & Social Voice (Born 1945), renowned for Tarkash (poetry collection), Lava.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Javed Akhtar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Born 1945, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Javed Akhtar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Javed Akhtar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Javed Akhtar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Javed Akhtar?
Javed Akhtar was a renowned Cinematic Legend, Shayar & Social Voice (Born 1945) from Gwalior, Madhya Pradesh, India, widely celebrated for LEGENDARY SCRIPTWRITER (SALIM-JAVED), NATIONAL AWARD WINNING LYRICIST, SAHITYA AKADEMI LAUREATE, PADMA BHUSHAN.
What is the central philosophy and message of Javed Akhtar?
The central philosophy of Javed Akhtar centers around Secular rationalism, existential depth of modern life, conversational Urdu poetry, defiance of orthodoxy, leaving timeless guidance for humanity.
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Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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