नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Janna (कवि जन्न)
Janna was an eminent 13th-century Kannada court poet of the Hoysala Empire, revered as Kavichakravarthi for Yashodhara Charite exploring ethics and non-violence.

नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— JANNA • HOYSALA EMPIRE GOLDEN AGE

नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— JANNA • HOYSALA EMPIRE GOLDEN AGE
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‘नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— Janna
Sher #1 • Classic Couplet
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘धरती की छाती पर जिसने तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Janna
Sher #2 • Passionate Verse
धरती की छाती पर जिसने तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— Janna
Sher #3 • Soulful Couplet
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,
Immortal Couplets & Ghazals
धरती की छाती पर जिसने तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem ki is paavan dhaaraa mein sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem nagar ka vaasee banakar use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हरि की कृपा का पावन साया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Tere deedaar ki ek jhalak ne dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem nagar ka vaasee banakar jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
संतन की संगति में आकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सत्य का दीप जब जलता है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

दर्द की रात में जब कोई को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अकेलेपन की इस राह पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Dard ki raat mein jab koee ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Akelepan ki is raah par tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मन के मैल को जिसने धोया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अमर नाम जग में उसी का लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

कोई न अपना इस जग में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे दिल की इस वीणा से सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Koee na apanaa is jag mein cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Toote dil ki is veenaa se sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,शांति और संतोष का धन जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

कोई न अपना इस जग में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Koee na apanaa is jag mein koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Jeevan ke is kathin mod par sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
नाम और दौलत तो माटी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

ठोकर खाकर जो संभलता कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,समय की अमूल्य बूँदों को और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Samay ki amooly boondon ko aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सदाचार की पावन वेदी पर वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सदाचार की पावन वेदी पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,मेहनत और लगन से जिसने अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Mehanat aur lagan se jisane apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

अहंकार की दीवारें जब अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,विपदाओं से जो कभी न डरा अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Ahankaar ki deevaaren jab agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Vipadaaon se jo kabhee na daraa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
संतन की संगति में आकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

मैं और मेरा का भ्रम कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,परम चेतना का आलोक जब फैला तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Main aur mera ka bhram kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Param chetanaa ka aalok jab phailaa tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
नाम और दौलत तो माटी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन की वीणा बज उठी जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

काल का पहिया घूमता है कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,शाश्वत सत्य की इस पावन वेदी पर जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Shaashvat saty ki is paavan vedee par jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

घट-घट में वह एक अनंता इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Jisane is nashvar shareer ka moh to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
फासले मिट गए जब दिल से पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन धारा में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

धरती की छाती पर जिसने तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Dharatee ki chhaatee par jisane to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Hriday mein jisake dayaa basee hai use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
नैन मिले जब नैनन से तब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैन मिले जब नैनन से तब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैन मिले जब नैनन से तब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

सत्य का दीप जब जलता है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Saty ka deep jab jalataa hai to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरे मिलन की आस में बीते संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे दीदार की एक झलक ने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai bharam ka pardaa tore amrit ras ki varshaa hove jab moh mukh more,Satsang ki nirmal gangaa mein usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम का अनुराग ही जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नाम और दौलत तो माटी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Naam aur daulat to maatee antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
तेरी आँखों की झील में जो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे प्रेम की यही निशानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

तेरे दीदार की एक झलक ने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Tere deedaar ki ek jhalak ne us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Amar prem ki amar kahaanee usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
प्रियतम की याद में जो नैना जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अमर प्रेम की अमर कहानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम का दीपक अंतर में जो नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem rang mein jo rang gaya jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
तेरी आँखों की झील में जो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अंतर में जब प्रेम समाया उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

नैन मिले जब नैनन से तब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Nain mile jab nainan se tab doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Aankhon ke raste dil mein utaraa naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैन मिले जब नैनन से तब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

घायल की गति घायल जाने भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,अकेलेपन की इस राह पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Akelepan ki is raah par koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
टूटे दिल की ख़ामोशी में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब कोई सहारा न बचा कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,इस दर्द भरे दिल की सदा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

घायल की गति घायल जाने जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब धैर्य की सीमा टूट गई तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
नैनों से जो नीर बहे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दिल के फफोलों को देखकर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
दर्द की रात में जब कोई को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अकेलेपन की इस राह पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
जिसके दिल पर बीत रही जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

जिसके दिल पर बीत रही चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए सपनों की किरचें तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Jisake dil par beet rahi cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Toote hue sapanon ki kirachen tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
विरह की अगन में जलता मन भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
घायल की गति घायल जाने कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
दर्द की रात में जब कोई हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब सबने मुँह फेर लिया जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आँखों के आँसू जब सूखे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म के मारों की बस्ती में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

अहंकार की दीवारें जब कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,जिसने समय की चाल पहचानी वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Ahankaar ki deevaaren jab kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Jisane samay ki chaal pahachaanee woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
घायल की गति घायल जाने भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,अकेलेपन की इस राह पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
विरह की अगन में जलता मन और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
जिसके दिल पर बीत रही कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब सबने मुँह फेर लिया पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आशा का दीप जब बुझने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

दुःख में सुमिरन सब कोई जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जो सबको अपना मान के चले मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Duhkh mein sumiran sab koee jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jo sabako apanaa maan ke chale manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब नयनों के सब आँसू सूखे सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
सांस-सांस में याद तुम्हारी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,इस दर्द भरे दिल की सदा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
कोई न अपना इस जग में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे दिल की इस वीणा से सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

गिरने में कोई हार नहीं अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जिसने अहंकार को त्याग दिया और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Girane mein koee haar nahi agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
मन के कोने में सिमटी हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
About Janna (कवि जन्न) — The Maestro of Human Emotion
Janna was an eminent 13th-century Kannada court poet of the Hoysala Empire, revered as Kavichakravarthi for Yashodhara Charite exploring ethics and non-violence.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Janna pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Hoysala Empire Golden Age, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Janna captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Janna's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Janna effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Janna
Authentic answers about Janna's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Janna and what was their literary significance?
Janna (12th Century CE–13th Century CE) was a monumental figure in Kannada/Classical literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Janna's poetry?
The core themes across Janna's oeuvre encompass अहिंसा, करुणा और जीवदया, काम-वासना व मोह का विनाशकारी प्रभाव, आत्मा की नैतिक शुद्धि, जैन दर्शन व आध्यात्मिक शांति, मानवीय नियति व पश्चात्ताप, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Janna's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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