तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
Jan Nisar Akhtar (जाँ निसार अख़्तर)
جاں نثار اختر
Jan Nisar Akhtar was an eminent Progressive Urdu poet and film lyricist whose work blended revolutionary idealism with tender portrayals of marital love.
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‘तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।’— Jan Nisar Akhtar
Sher #1 • Classic Couplet
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,

‘तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।’— Jan Nisar Akhtar
Sher #2 • Passionate Verse
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,

‘ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।’— Jan Nisar Akhtar
Sher #3 • Soulful Couplet
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,
Immortal Couplets & Ghazals
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
About Jan Nisar Akhtar (जाँ निसार अख़्तर) — The Maestro of Human Emotion
Jan Nisar Akhtar was an eminent Progressive Urdu poet and film lyricist whose work blended revolutionary idealism with tender portrayals of marital love.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Jan Nisar Akhtar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Progressive Urdu Lyric Era, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Jan Nisar Akhtar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Jan Nisar Akhtar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Jan Nisar Akhtar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Jan Nisar Akhtar
Authentic answers about Jan Nisar Akhtar's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Jan Nisar Akhtar and what was their literary significance?
Jan Nisar Akhtar (1914–1976) was a monumental figure in Urdu/Progressive literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Jan Nisar Akhtar's poetry?
The core themes across Jan Nisar Akhtar's oeuvre encompass 'घर आँगन' और गृहस्थी का पवित्र प्रेम, मज़दूर और मेहनतकश अवाम की आवाज़, ख़ामोश दर्द और यादों का कारवाँ, नफ़ासत भरी गज़लगोई और नज़्म, उम्मीद और नए सवेरे का यक़ीन, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Jan Nisar Akhtar's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Jan Nisar Akhtar?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Jan Nisar Akhtar's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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