तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,। Haft Awrang,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
Nur ad-Din Jami (नूरुद्दीन जामी)
نور الدین جامی
Mawlana Nur ad-Din Abd ar-Rahman Jami is revered as the last great classical poet of Persia, famed for his mystical epic 'Yusuf and Zulaikha' and spiritual discourses.
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‘तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,। Haft Awrang,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।’— Nur ad-Din Jami
Sher #1 • Classic Couplet
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,। Haft Awrang,

‘दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।’— Nur ad-Din Jami
Sher #2 • Passionate Verse
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,

‘सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।’— Nur ad-Din Jami
Sher #3 • Soulful Couplet
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,
Immortal Couplets & Ghazals
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,। Haft Awrang,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Haft Awrang,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Haft Awrang,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Haft Awrang,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,। Haft Awrang,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Haft Awrang,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Haft Awrang,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,। Haft Awrang,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Haft Awrang,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Haft Awrang,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Haft Awrang,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,। Haft Awrang,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Haft Awrang,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,। Haft Awrang,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Haft Awrang,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Haft Awrang,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Haft Awrang,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Haft Awrang,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Haft Awrang,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Haft Awrang,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Haft Awrang,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Haft Awrang,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
About Nur ad-Din Jami (नूरुद्दीन जामी) — The Maestro of Human Emotion
Mawlana Nur ad-Din Abd ar-Rahman Jami is revered as the last great classical poet of Persia, famed for his mystical epic 'Yusuf and Zulaikha' and spiritual discourses.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Nur ad-Din Jami pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Timurid Renaissance, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Nur ad-Din Jami captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Nur ad-Din Jami's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Nur ad-Din Jami effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Nur ad-Din Jami
Authentic answers about Nur ad-Din Jami's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Nur ad-Din Jami and what was their literary significance?
Nur ad-Din Jami (1414–1492) was a monumental figure in Persian/Sufi literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Nur ad-Din Jami's poetry?
The core themes across Nur ad-Din Jami's oeuvre encompass यूसुफ़ और ज़ुलैख़ा का रूहानी इश्क़, हफ़्त औरंग की दार्शनिक दास्तानें, तसव्वुफ़ और वहदत-उल-वुजूद की रौशनी, दुनिया की नापायदारी और मौत की हक़ीक़त, दिल की पाकीज़गी और इबादत, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Nur ad-Din Jami's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Nur ad-Din Jami?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Nur ad-Din Jami's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Nur ad-Din Jami?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Nur ad-Din Jami's poetry?
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Where is Nur ad-Din Jami's memorial or tomb located?
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