जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Jainendra Kumar (जैनेंद्र कुमार)
Jainendra Kumar was an illustrious figure in Pioneer of Psychological Realism in Hindi (1905–1988), renowned for Sunita, Tyagpatra.

जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
— JAINENDRA KUMAR • 1905–1988

जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
— JAINENDRA KUMAR • 1905–1988
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‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— Jainendra Kumar
Sher #1 • Classic Couplet
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,

‘नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— Jainendra Kumar
Sher #2 • Passionate Verse
नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— Jainendra Kumar
Sher #3 • Soulful Couplet
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,
Immortal Couplets & Ghazals
नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

फासले मिट गए जब दिल से दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जब से नैना रूप में उलझे सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Phaasale mit gaye jab dil se dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Jab se nainaa roop mein ulajhe sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Man mandir mein basaa jo moorati dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Aankhon ke raste dil mein utaraa utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Antar ghat mein jab jyoti jagee jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ki mastee mein jo jhoomaa jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
अहंकार की दीवारें जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हरि की कृपा का पावन साया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,शांति और संतोष का धन जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नदिया की धारा बहती जावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन मंदिर में जो दीप जले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

कोई न अपना इस जग में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई चारासाज़ न मिला सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Koee na apanaa is jag mein ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Jab koee chaaraasaaz na mila sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,शांति और संतोष का धन जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

ग़म का मारा पंछी जैसे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
धरती की छाती पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

दर्द की रात में जब कोई दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस गहरी रात में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Dard ki raat mein jab koee dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Gham ki is gaharee raat mein arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सदाचार की पावन वेदी पर अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

वाणी में जो अमृत घोले चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जिसने परोपकार का दीप जलाया वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Vaanee mein jo amrit ghole chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,परहित में जिसने जीवन सौंपा वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नाम और दौलत तो माटी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

चंद साँसों की मोहलत में उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,सत्य और धर्म की राहों पर उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Chand saanson ki mohalat mein usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Saty aur dharm ki raahon par usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
संतन की संगति में आकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हृदय में जिसके दया बसी है उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
माटी का यह देह बना है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
वाणी वही जो घाव भरे और सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

धैर्य और संतोष का धन जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्संगति का पावन प्रभाव मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Dhairy aur santosh ka dhan jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Satsangati ka paavan prabhaav manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,नेकी की राह पे जो जन उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रेम की डोर में बंध गया जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

काल का पहिया घूमता है जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,अंतःकरण जब दर्पण की तरह तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Antahkaran jab darpan ki tarah to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,मन मंदिर की पावन आरती प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

मैं और मेरा का भ्रम व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,शाश्वत सत्य की इस पावन वेदी पर जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Main aur mera ka bhram vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Shaashvat saty ki is paavan vedee par jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
प्रेम बिना सब सूना जग में सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जब से नैना रूप में उलझे सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

संतन की संगति में आकर बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Santan ki sangati mein aakar barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Naam aur daulat to maatee man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Saty vachan jo mukh se bole ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरी आँखों की झील में जो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

नदिया की धारा बहती जावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Jeevan ka yeh paavan sootr jo use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के चरणों में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
फासले मिट गए जब दिल से रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जब से नैना रूप में उलझे जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनन आगे तू ही तू नाचे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Vaanee mein jo amrit ghole antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Saadhu purush ki vaanee kabhee jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरी याद का पावन साया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम रंग में जो रंग गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Satkarmon ki amit jyoti jab baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Amar naam jag mein usee ka ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह की रात जब ढलने लगी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
फासले मिट गए जब दिल से अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम सुधा का रस जो चखा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

तेरी आँखों की झील में जो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Virah ki raat jab dhalane lagee to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम बिना सब सूना जग में बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह की रात जब ढलने लगी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह की रात जब ढलने लगी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Prem ki paavan vedee par jisane se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Virah ki raat jab dhalane lagee jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम का दीपक अंतर में जो और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Tere roop ki paavan jhaankee amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Prem ka deepak antar mein jo aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
तेरी याद का पावन साया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह की रात जब ढलने लगी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे दीदार की एक झलक ने जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम का दीपक अंतर में जो और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Aankhon ke aansoo jab sookhe doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Dard ki bhattee mein tapakar hi zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब सबने मुँह फेर लिया केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
ग़म का मारा पंछी जैसे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

ग़म का मारा पंछी जैसे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस आँधी ने जब तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Gham ki is aandhee ne jab to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
दर्द की रात में जब कोई जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द का यह गहरा सागर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दर्द की रात में जब कोई अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब कोई सहारा न बचा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
कोई न अपना इस जग में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई चारासाज़ न मिला सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
घायल की गति घायल जाने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

ग़म का मारा पंछी जैसे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
दर्द की रात में जब कोई भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब आशा की हर किरण बुझी तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द का यह गहरा सागर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
ग़म की तपती दुपहरी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
सपनों के महल जब टूटे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

जीवन का यह कठिन सफ़र जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जिसने परोपकार का दीप जलाया जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Jeevan ka yeh kathin safar jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दिल के फफोलों को देखकर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
वक़्त की आँधी ने तोड़े बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
दर्द की रात में जब कोई यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब सबने मुँह फेर लिया पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

वाणी में जो अमृत घोले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संगति का पावन प्रभाव मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Vaanee mein jo amrit ghole bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Satsangati ka paavan prabhaav manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
कोई न अपना इस जग में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब सबने मुँह फेर लिया तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,इस दर्द भरे दिल की सदा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
टूटे दिल की ख़ामोशी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,इस दर्द भरे दिल की सदा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,विपदाओं से जो कभी न डरा और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Vipadaaon se jo kabhee na daraa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
वक़्त की आँधी ने तोड़े चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
About Jainendra Kumar (जैनेंद्र कुमार) — The Maestro of Human Emotion
Jainendra Kumar was an illustrious figure in Pioneer of Psychological Realism in Hindi (1905–1988), renowned for Sunita, Tyagpatra.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Jainendra Kumar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1905–1988, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Jainendra Kumar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Jainendra Kumar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Jainendra Kumar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Jainendra Kumar?
Jainendra Kumar was a renowned Pioneer of Psychological Realism in Hindi (1905–1988) from Kodia Ganj, Aligarh, Uttar Pradesh, India, widely celebrated for FATHER OF PSYCHOLOGICAL REALISM IN HINDI, GANDHIAN THINKER, SAHITYA AKADEMI & PADMA BHUSHAN LAUREATE.
What is the central philosophy and message of Jainendra Kumar?
The central philosophy of Jainendra Kumar centers around Inner psychological exploration of women, non-violent resolution of moral crises, subtle Gandhian ethics applied to modern life, leaving timeless guidance for humanity.
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Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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