निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
Insha Allah Khan Insha (इन्शा अल्ला ख़ाँ 'इन्शा')
انشاء اللہ خاں انشاء
Insha Allah Khan Insha was a legendary multilingual wit, poet, and linguistic genius who pioneered modern Hindustani fiction in Rani Ketki Ki Kahani.

निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
— INSHA ALLAH KHAN INSHA • LAKHNAVI RENAISSANCE (1756–1817)

निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
— INSHA ALLAH KHAN INSHA • LAKHNAVI RENAISSANCE (1756–1817)
Download Aesthetic Insha Allah Khan Insha Story Cards

‘निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।’— Insha Allah Khan Insha
Sher #1 • Classic Couplet
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,

‘तिरे ख़याल की खुशबू बसी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।’— Insha Allah Khan Insha
Sher #2 • Passionate Verse
तिरे ख़याल की खुशबू बसी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,

‘अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,बहार आए न आए चमन महकता बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।’— Insha Allah Khan Insha
Sher #3 • Soulful Couplet
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,
Immortal Couplets & Ghazals
तिरे ख़याल की खुशबू बसी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,बहार आए न आए चमन महकता बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,सहर की पहली किरन ने पयाम बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
Nigaaha-e-shauq ne har manzar pahachaan koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Tiri khaamoshi mein chhupaa pyaar dekhaa manzar diyaa har saans mein naghmaa saa goonjane lagaa.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
नसीब में जो लिखा था वही चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,दुआ का हाथ उठा तो करम का दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

मोहब्बत की गली में जो भी में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
Mohabbat ki galee mein jo bhi mein bayaan ho ye to khaamosh nazar ki zabaan hai,Har ik mod pe tira deedaar mila jaanaa ki haqeeqata-e-hayaat kyaa hotee hai.
तिरे करम का सहारा जो मिल गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,सहर की पहली किरन ने पयाम में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।

तिरी यादों के गुलशन में जब आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी याद जब भी दिल में उभरी कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
Tiri yaadon ke gulashan mein jab aayaa to dil ki har dharakan ibaadat ban gayi,Tiri yaad jab bhi dil mein ubharee kabhee koee khaufa-e-judaaee nahi hotaa.
ख़ुदी को खो के जो पाया वो चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,तिरी पनाह में आके मिली वो आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,ज़माने भर की निगाहों से बच के के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत तो दिल को अजब सा सुकून मिला,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
नज़र नज़र में समाई है जब यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

ग़म की तपती हुई दोपहर में हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।
Gham ki tapatee hui dopahar mein hua ki apanee hi parachhaaeen se dar lagane lagaa,Zindagi bojh see lagane lagee to wahaan bhi dard ka gulashan khil uthaa.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
नज़र नज़र में समाई है जब तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी राह में कभी कोई सौदा न किया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।

दर्द जब हद से गुज़रा तो सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
Dard jab had se guzaraa to sukoon dhoondhate rahe magar har taraf sannaataa tha,Dil ke zakhmon ko chhupaate rahe ka maaraa subah ka intizaar karataa raha.
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,नज़र झुका के जो देखा तो दिल तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
नज़र नज़र में समाई है जब तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

नेक नीयत से जो क़दम उठाया मोड़ पे जो साबित क़दम रहा वही सुरख़रू हुआ,नेकियों की पूंजी जो संग लेकर सिखाया कि कैसे तूफ़ानों में चिराग़ जलाया जाता है।
Nek neeyat se jo qadam uthaayaa mod pe jo saabit qadam raha vahee surakharoo hua,Nekiyon ki poonjee jo sang lekar sikhaayaa ki kaise toofaanon mein chiraagh jalaayaa jaataa hai.
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

ज़िंदगी की हक़ीक़त को जिसने समझ साहिल न रुका जो बहता रहा वही समंदर में मिला,सफ़र की कठिनाइयों से जो न ओर बढ़ा रास्ता खुद उसके लिए आसान हो गया।
Zindagi ki haqeeqat ko jisane samajh saahil na rukaa jo bahataa raha vahee samandar mein mila,Safar ki kathinaaiyon se jo na or barhaa raasta khud usake lie aasaan ho gaya.
सुख़न के आईने में सच की तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,बहार आए न आए चमन महकता के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,हमारी आँख में जलते रहे कई के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।

कर्म की खेती जो इंसान बोता मिला हमको तिरी रज़ा पे सर झुका दिया हमने,ज़िंदगी की किताब के हर पन्ने काँटे दोनों हैं काँटों पे चलके ही मंज़िल मिलती है।
Karm ki khetee jo insaan botaa mila hamako tiri razaa pe sar jhukaa diyaa hamane,Zindagi ki kitaab ke har panne kaante donon hain kaanton pe chalake hi manzil milatee hai.
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,हमारी आँख में जलते रहे कई गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।

वजूद-ओ-अदम के चक्कर से जो उसने फ़क़ीरी में भी सल्तनत का मज़ा चख लिया,ईश्वर का वास किसी मंदिर में है जो पी ले वो अमर पद को सहज ही पा जाता है।
Vajooda-o-adam ke chakkar se jo usane faqeeree mein bhi saltanat ka mazaa chakh liyaa,Eeshvar ka vaas kisee mandir mein hai jo pee le wo amar pad ko sahaj hi paa jaataa hai.
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,हमारी आँख में जलते रहे कई गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरी निगाह का जादू जो चल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस इक उसने फ़क़ीरी में भी सल्तनत का मज़ा चख लिया,मोह-माया के बंधन तोड़ के तो अज्ञान का हर अंधेरा पल भर में काफूर हो गया।
Mrityu koee ant nahi bas ik usane faqeeree mein bhi saltanat ka mazaa chakh liyaa,Moha-maayaa ke bandhan tor ke to ajnyaan ka har andhera pal bhar mein kaaphoor ho gaya.
नज़र नज़र में समाई है जब ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।

परमसत्य का द्वार खुला तो जाना क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,काल की सीमा से परे जो नहीं सकता ये तो अफ़लाक से परे का सफ़र है।
Paramasaty ka dvaar khulaa to jaanaa qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Kaal ki seemaa se pare jo nahi sakataa ye to afalaak se pare ka safar hai.
तिरी आँखों की गहराइयों में खो नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,मोहब्बत के पावन सफ़र में गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
तिरे करम का सहारा जो मिल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
तिरी यादों के गुलशन में जब उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,मोहब्बत के पावन सफ़र में तो हर इक अश्क सितारा बन गया।

तिरे ख़याल की खुशबू बसी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
Tire khayaal ki khushaboo basee hamane havaaon ki talkhiyon ke baavajood,Sukoona-e-dil ki talaasha-e-davaa mein pukaaraa magar hum apane ahad pe qaayam rahe.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,वफ़ा की कसम खाके हमने तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,तिरी पनाह में आके मिली वो आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
Nigaaha-e-shauq ne har mod pe chalatee rahi koee hamasafar na mila,Tiri panaah mein aake mili wo aasaaish jo saltanat ke khazaanon mein bhi na thi.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरी चाहत का नशा रूह में पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरी दीद की आरज़ू में कटी तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।

ख़ुदी को खो के जो पाया वो तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
Khudee ko kho ke jo paayaa wo to na the magar zamaane ne daastaan banaa dee,Sukoona-e-dil ki talaasha-e-davaa mein aasaaish jo saltanat ke khazaanon mein bhi na thi.
मोहब्बत की गली में जो भी में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरे अक्स को देखा जो दिल नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरी चाहत का नशा रूह में उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,हमारी आँख में जलते रहे कई गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
Hazaar baar zamaane ne aazamaayaa hamane havaaon ki talkhiyon ke baavajood,Hamaaree aankh mein jalate rahe kaee gaye jahaan koee saayaa-e-gham na tha.
तिरी आँखों की गहराइयों में खो अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरी निगाह का जादू जो चल आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,मोहब्बत के पावन सफ़र में मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,वफ़ा की कसम खाके हमने गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

वफ़ा का जाम जो पी ले वो बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
Vafaa ka jaam jo pee le wo banee hamaaree aankhon ki beenaaee barh gayi,Dilon ke taaalluq ko sadiyon ki sukoon paayaa wo saltanat ke takht pe bhi na tha.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी याद जब भी दिल में उभरी तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी चाहत का नशा रूह में मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,मोहब्बत के पावन सफ़र में मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
Qadama-ba-qadam tira naqsha-e-vafaa gaya zamaane ki har ik rasm beasar ho gayi,Mohabbat ke paavan safar mein munavvar hua ki chaandanee bhi maat khaa gayi.
नज़र नज़र में समाई है जब आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरी यादों के गुलशन में जब आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी याद जब भी दिल में उभरी कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरे अक्स को देखा जो दिल भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
इश्क़ जब रूह की गहराई में इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।

मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
Miri jaan tire tabassum pe nisaar amar ho gaya zamaane ki maut use chhoo na sakee,Tiri saadagee pe fidaa ho gayi sukoon paayaa wo saltanat ke takht pe bhi na tha.
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी याद जब भी दिल में उभरी मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
इश्क़ जब रूह की गहराई में में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham so gaya chupachaap koee aavaaz na thi,Khaamosh labon ki pukaar arsh tha apanee hi dhadkanon ka maatam karataa hua.
तिरी यादों के गुलशन में जब बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,रात की स्याही में घुला दर्द नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,दर्द का दरिया पार करना था दिया वो दर्द जो लफ़्ज़ों में न समा सका।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,ग़म के मारों का कोई आशियाना तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।
Shaba-e-firaaq ke taare gavaahee dete ibaarata-e-gham the jise koee parh na sakaa,Gham ke maaron ka koee aashiyaanaa tak pahunchee jahaan khuda ne sunee hamaaree fariyaad.
अकेलेपन की धूप में जब साया ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
दर्द जब हद से गुज़रा तो छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
तिरे जाने के बाद ये आलम रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,आह जो सीने से निकली वो ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
आँखों से जो अश्क बहे वो जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,दर्द की वादियों में जब भी मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।

अकेलेपन की धूप में जब साया जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
Akelepan ki dhoop mein jab saaya jaane har boond mein lahoo-e-jigar shaamil tha,Akelepan ka zahar piyaa hamane ka maaraa subah ka intizaar karataa raha.
दिल के वीराने में बस एक वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,दर्द की वादियों में जब भी कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
अकेलेपन की धूप में जब साया सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
आँखों से जो अश्क बहे वो सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।

गिर के उठना ही मर्दानगी की बंदे हर साँस में किसी के काम आने की कोशिश कर,वक़्त की क़द्र जिसने पहचानी लिया उसने हर हाल में ख़ुशी का रास्ता पा लिया।
Gir ke uthanaa hi mardaanagee ki bande har saans mein kisee ke kaam aane ki koshish kar,Waqt ki qadr jisane pahachaanee liyaa usane har haal mein khushee ka raasta paa liyaa.
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
अकेलेपन की धूप में जब साया मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर का सफ़र है आज ग़म तो कल ख़ुशी का सूरज चमकेगा,हर ठोकर ने हमें चलना सिखाया उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
Chalate rahanaa hi musaafir ka muqaddar ka safar hai aaj gham to kal khushee ka sooraj chamakegaa,Har thokar ne hamen chalanaa sikhaayaa usakaa naam itihaas ke pannon mein amar ho gaya.
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं दिया वो दर्द जो लफ़्ज़ों में न समा सका।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
ग़म की तपती हुई दोपहर में हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र मिला हमको तिरी रज़ा पे सर झुका दिया हमने,सलीक़ा जीने का जिसने सीख कहा उसका रुतबा फ़रिश्तों से भी बुलंद हुआ।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar mila hamako tiri razaa pe sar jhukaa diyaa hamane,Saleeqaa jeene ka jisane seekh kahaa usakaa rutabaa farishton se bhi buland hua.
दिल के वीराने में बस एक साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
About Insha Allah Khan Insha (इन्शा अल्ला ख़ाँ 'इन्शा') — The Maestro of Human Emotion
Insha Allah Khan Insha was a legendary multilingual wit, poet, and linguistic genius who pioneered modern Hindustani fiction in Rani Ketki Ki Kahani.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Insha Allah Khan Insha pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Lakhnavi Renaissance (1756–1817), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Insha Allah Khan Insha captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Insha Allah Khan Insha's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Insha Allah Khan Insha effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
Explore Other Ghazal Masters
Create Aesthetic Cards in Under 30 Seconds
Select your favourite shayari or quote, choose an ethereal cosmic gradient, adjust the font to Noto Serif Devanagari, and export immediately.
- No sign up
- No watermark
- Free forever
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic PoetryMessages for every occasion and every person
Pick who you are writing to, or the festival, and open a ready collection.
- Birthday for dadWarm lines for the man who raised you
- Anniversary for husbandSweet notes for the one by your side
- Good morning, familyA bright start for the family group
- Good night, girlfriendSoft words before she sleeps
- Diwali wishesFestive messages for family and friends
- Holi wishesColourful lines for your friends
- Eid wishesEid Mubarak for your loved ones
- Farewell, colleagueKind goodbyes for a teammate
- CongratulationsCheer on a friend's big win
- Miss you, girlfriendFor the days when distance feels long
- Funny birthdayLight-hearted wishes for a best friend
- Christmas wishesSeason's greetings for the family
Popular searches
- Breakup Shayari for Girlfriend
- Attitude Shayari for Boys
- Attitude Shayari for Girls
- Attitude Status for Boys
- Alone Shayari
- 2 Line Attitude Shayari
- 2 Line Breakup Shayari
- Love Shayari for Girlfriend
- Miss You Shayari for Girlfriend
- Emotional Shayari for Mom
- Heart Touching Shayari for Husband
- Birthday Wishes for Wife
- Birthday Wishes for Husband
- Love Status for WhatsApp
- Inspirational Quotes for Students
- Life Quotes for Self
Poets, Festivals & Status
Read the voices behind the verses, plan ahead for festivals and grab a quick status line
Essential Questions About Insha Allah Khan Insha
Authentic answers about Insha Allah Khan Insha's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
Still have a question? Contact us
Who was Insha Allah Khan Insha and what was their literary significance?
Insha Allah Khan Insha (1756–1817) was a monumental figure in Urdu/Classical literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Insha Allah Khan Insha's poetry?
The core themes across Insha Allah Khan Insha's oeuvre encompass हाज़िरजवाबी, शोख़ी और ज़िंदादिली, भाषा का चमत्कार व व्याकरण, इश्क़-ओ-मोहब्बत के रंगीन नक़्श, वक़्त की नज़ाकत और सफ़र, दरबारी तहज़ीब और शायरी, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Insha Allah Khan Insha's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Insha Allah Khan Insha?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Insha Allah Khan Insha's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Insha Allah Khan Insha?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Insha Allah Khan Insha's poetry?
Yes! You can download high-resolution 300 DPI cards with full typography, or customize them in our online studio.
Where is Insha Allah Khan Insha's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Insha Allah Khan Insha stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
Ready to Express Yourself?
Pick a line, add your style and send it off. Your first card is a few taps away.






