हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
Hemchandra Barua (हेमचंद्र बरुआ)
Hemchandra Barua was a distinguished Father of Assamese Lexicon representing the Assamese/Renaissance tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
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‘हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।’— Hemchandra Barua
Sher #1 • Classic Couplet
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।’— Hemchandra Barua
Sher #2 • Passionate Verse
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।’— Hemchandra Barua
Sher #3 • Soulful Couplet
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,
Immortal Couplets & Ghazals
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

हेमचंद्र बरुआ कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
About Hemchandra Barua (हेमचंद्र बरुआ) — The Maestro of Human Emotion
Hemchandra Barua was a distinguished Father of Assamese Lexicon representing the Assamese/Renaissance tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Hemchandra Barua pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Assamese/Renaissance (1835–1896), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Hemchandra Barua captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Hemchandra Barua's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Hemchandra Barua effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Hemchandra Barua
Authentic answers about Hemchandra Barua's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Hemchandra Barua and what was their literary significance?
Hemchandra Barua (1835–1896) was a monumental figure in Assamese/Renaissance literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Hemchandra Barua's poetry?
The core themes across Hemchandra Barua's oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Hemchandra Barua's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Hemchandra Barua?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Hemchandra Barua's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Hemchandra Barua?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Hemchandra Barua's poetry?
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Where is Hemchandra Barua's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Hemchandra Barua stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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