नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Guru Gobind Singh (गुरु गोविंद सिंह)
Guru Gobind Singh was an illustrious figure in Spiritual Master & Sant-Sipahi (1666–1708), renowned for Dasam Granth, Jaap Sahib.

नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
— GURU GOBIND SINGH • 1666–1708

नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
— GURU GOBIND SINGH • 1666–1708
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‘नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— Guru Gobind Singh
Sher #1 • Classic Couplet
नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— Guru Gobind Singh
Sher #2 • Passionate Verse
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।’— Guru Gobind Singh
Sher #3 • Soulful Couplet
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,
Immortal Couplets & Ghazals
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

नैनों के दर्पण में बसा जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Nainon ke darpan mein basaa jab dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Priyatam ke rang mein rang kar jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
संतन की संगति में आकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,जीवन का यह पावन सूत्र जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मन के मैल को जिसने धोया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Nainan aage too hi too naache to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Prem ki is paavan dhaaraa mein to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अहंकार का त्याग किया जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य-अहिंसा की राहों पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem ki paavan vedee par jisane haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem ki is paavan ghaatee mein naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

दिल का आईना जब टूटा किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई सहारा न बचा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Dil ka aaina jab tootaa kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab koee sahaaraa na bachaa tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,भवसागर की लहरों से जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,शांति और संतोष का धन जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य वचन जो मुख से बोले परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

सांस-सांस में याद तुम्हारी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Zindagi ki is soonee dagar par to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
अहंकार की दीवारें जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अमर नाम जग में उसी का व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

दर्द की रात में जब कोई भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब आशा की हर किरण बुझी ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Dard ki raat mein jab koee bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Jab aashaa ki har kiran bujhee zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,नेकी की राह पे जो जन निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
माटी का यह देह बना है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हरि की कृपा का पावन साया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,जो सबको अपना मान के चले है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Jo sabako apanaa maan ke chale hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

जिसने मन को जीत लिया मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जीवन की सच्ची पूँजी वही बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Jisane man ko jeet liyaa mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jeevan ki sachchee poonjee vahee bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
मन के निर्मल दर्पण में जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

धैर्य और संतोष का धन मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जीवन की सच्ची पूँजी वही सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Dhairy aur santosh ka dhan mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jeevan ki sachchee poonjee vahee saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नदिया की धारा बहती जावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,माटी का चोला पाकर जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

मोह-निशा जब ढलती है कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,परम चेतना का आलोक जब फैला जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Moha-nishaa jab dhalatee hai kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Param chetanaa ka aalok jab phailaa jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

साधु वो ही जो अंतर कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,ब्रह्मलीन होकर जो जन स्थित उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Saadhu wo hi jo antar kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Brahmaleen hokar jo jan sthit usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अंतर में जब प्रेम समाया जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

साधु वो ही जो अंतर व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,परम पद की प्राप्ति उसी को होती तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Saadhu wo hi jo antar vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Param pad ki praapti usee ko hotee tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
तेरी आँखों की झील में जो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन की वीणा बज उठी जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम का दीपक अंतर में जो युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Sataguru mile to raah dikhaave man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Satya-ahinsaa ki raahon par maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम रंग में जो रंग गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम नगर का वासी बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Naam aur daulat to maatee saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम की चाहत में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,मन मंदिर की पावन आरती जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रियतम की याद में जो नैना रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अंतर में जब प्रेम समाया और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Nekee ki raah pe jo jan vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अमर प्रेम की अमर कहानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रियतम की याद में जो नैना डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अंतर में जब प्रेम समाया एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम का दीपक अंतर में जो संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ki is paavan ghaatee mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
तेरी याद का पावन साया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के चरणों में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जब से नैना रूप में उलझे मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

प्रेम गली अति साँकरी जामें का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem galee ati saankaree jaamen ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
मन की वीणा बज उठी जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Ishq ki raah anokhee bande tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Priyatam ke rang mein rang kar sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
फासले मिट गए जब दिल से जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरी याद का पावन साया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अंतर में जब प्रेम समाया उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

घायल की गति घायल जाने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Andheree raat ke sannaate mein keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनों से जो नीर बहे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
मन के कोने में सिमटी सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

विरह की अगन में जलता मन बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Virah ki agan mein jalataa man baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Zindagi ki is soonee dagar par tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
छाले पड़े हैं पाँवों में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
विरह की अगन में जलता मन भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब कोई चारासाज़ न मिला सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दिल का आईना जब टूटा किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई सहारा न बचा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
कोई न अपना इस जग में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,आँसुओं की इस भाषा को अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

सपनों के महल जब टूटे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Sapanon ke mahal jab toote doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Jab apanon ne hi diye zakhm to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
दर्द की रात में जब कोई पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अकेलेपन की इस राह पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
अकेलेपन की धूप जब साए पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब सबने मुँह फेर लिया सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
सपनों के महल जब टूटे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

धरती की छाती पर जिसने कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Jo doosaron ke sukh ki khaatir woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
घायल की गति घायल जाने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
ग़म का मारा पंछी जैसे हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब कोई सहारा न बचा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दिल का आईना जब टूटा हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द का यह गहरा सागर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
नैनों से जो नीर बहे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,इस दर्द भरे दिल की सदा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

कर्म की पावन वेदी पर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जो सबको अपना मान के चले पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Karm ki paavan vedee par man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jo sabako apanaa maan ke chale paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
जिसके दिल पर बीत रही को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
वक़्त की आँधी ने तोड़े जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
तन्हाई के अँधियारे में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
सांस-सांस में याद तुम्हारी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

जीवन की इस रणभूमि में हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Jeevan ki is ranabhoomi mein hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
नैनों से जो नीर बहे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की भट्टी में तपकर ही सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
About Guru Gobind Singh (गुरु गोविंद सिंह) — The Maestro of Human Emotion
Guru Gobind Singh was an illustrious figure in Spiritual Master & Sant-Sipahi (1666–1708), renowned for Dasam Granth, Jaap Sahib.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Guru Gobind Singh pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1666–1708, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Guru Gobind Singh captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Guru Gobind Singh's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Guru Gobind Singh effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Guru Gobind Singh?
Guru Gobind Singh was a renowned Spiritual Master & Sant-Sipahi (1666–1708) from Patna Sahib, Bihar, India, widely celebrated for TENTH SIKH GURU, CREATOR OF THE KHALSA PANTH, KALGIDHAR PATSHAH, WARRIOR-SAINT.
What is the central philosophy and message of Guru Gobind Singh?
The central philosophy of Guru Gobind Singh centers around Sant-Sipahi (Saint-Soldier), supreme defense of human dignity, righteous war against oppression (Dharamyudh), selfless sacrifice of family, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Guru Gobind Singh's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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