जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Farhat Ehsas (फ़रहत एहसास)
Farhat Ehsas was an illustrious figure in Modern Sufi Thinker & Master Lyricist (Born 1952), renowned for Tasawwuf aur Adab studies, Rekhta critical editions.
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‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— Farhat Ehsas
Sher #1 • Classic Couplet
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— Farhat Ehsas
Sher #2 • Passionate Verse
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— Farhat Ehsas
Sher #3 • Soulful Couplet
दीन-दुखी का आसरा बनकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,
Immortal Couplets & Ghazals
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
दीन-दुखी का आसरा बनकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

तेरे दीदार की एक झलक ने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Tere deedaar ki ek jhalak ne se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Priyatam ki chaahat mein jisane jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
आशा तृष्णा सब छूटी जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Man mandir mein basaa jo moorati palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Priyatam ka anuraag hi jisakaa ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य वचन जो मुख से बोले वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Tere milan ki aas mein beete jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Sachche prem ki yahee nishaanee ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
सत्य का दीप जब जलता है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Jisake dil par beet rahi par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Is dard bhare dil ki sadaa keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
मन मंदिर में जो दीप जले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Toote dil ki khaamoshi mein jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Aansuon ki is bhaashaa ko tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,भवसागर की लहरों से जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
संतन की संगति में आकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

जिसके दिल पर बीत रही हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द की भट्टी में तपकर ही पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Jisake dil par beet rahi hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Dard ki bhattee mein tapakar hi paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
नदिया की धारा बहती जावे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सदाचार की पावन वेदी पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मन के मैल को जिसने धोया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हृदय में जिसके दया बसी है अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

माटी का यह चोला पाकर मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,सत्संगति का पावन प्रभाव उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Maatee ka yeh cholaa paakar mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Satsangati ka paavan prabhaav use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
संतन की संगति में आकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मन के मैल को जिसने धोया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

कर्म की पावन वेदी पर है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,जीवन की सच्ची पूँजी वही मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Karm ki paavan vedee par hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Jeevan ki sachchee poonjee vahee manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अमर नाम जग में उसी का उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हृदय में जिसके दया बसी है व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

नेकी की राह पे जो जन भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जो गिरतों को उठाना जानता है उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Nekee ki raah pe jo jan bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,नेकी की राह पे जो जन उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,परमानंद का यह अलौकिक रस जिसने अपना शीश नवाया उसने परम मुक्ति का अमर वरदान प्राप्त कर लिया।
Antarman ke sannaate mein jab usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras jisane apanaa sheesh navaayaa usane param mukti ka amar varadaan praapt kar liyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,शांति और संतोष का धन जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रियतम की याद में जो नैना पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
नैन मिले जब नैनन से तब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Mrityu koee ant nahi bas hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के चरणों में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस और ज्ञान-भोर मुस्काए अमृत रस की बूँदें अंतर घट में बरसने लगती हैं,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Mrityu koee ant nahi bas aur jnyaana-bhor muskaae amrit ras ki boonden antar ghat mein barasane lagatee hain,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरी आँखों की झील में जो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे रूप की पावन झांकी से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Satya-ahinsaa ki raahon par ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अंतर में जब प्रेम समाया जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab bharam ka pardaa tore amrit ras ki varshaa hove jab moh mukh more,Satsang ki nirmal gangaa mein rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह की रात जब ढलने लगी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी याद का पावन साया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरी याद का पावन साया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी याद का पावन साया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,शांति और संतोष का धन जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Prem ki gangaa antar mein bahe saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Shaanti aur santosh ka dhan jo ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने प्रेम का मर्म समझ और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरी आँखों की झील में जो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Teri aankhon ki jheel mein jo tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Jisane prem ka marm samajh utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरे दीदार की एक झलक ने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने प्रेम का मर्म समझ और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Antar ghat mein jab jyoti jagee priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Jisane prem ka marm samajh aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनों के दर्पण में बसा जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Teri aankhon ki jheel mein jo dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Saanson ke har taar pe jisakaa utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरी याद का पावन साया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
मन मंदिर में बसा जो मूरति उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अंतर में जब प्रेम समाया प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

आँखों में जो नमी है वो दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Aankhon mein jo namee hai wo doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
तेरे दीदार की एक झलक ने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
विरह की अगन में जलता मन अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब नयनों के सब आँसू सूखे अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
ग़म का मारा पंछी जैसे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे हुए सपनों की किरचें तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

नैनों से जो नीर बहे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Nainon se jo neer bahe antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
भीतर-भीतर घुटता जाए को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
ग़म की तपती दुपहरी में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,इस दर्द भरे दिल की सदा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

छाले पड़े हैं पाँवों में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Chhaale pare hain paanvon mein par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Toote hue dil ka dard tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
उम्र भर का सफ़र और भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,टूटे दिल की इस वीणा से तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
टूटी नाव भँवर में फँसी सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
कोई न अपना इस जग में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म के मारों की बस्ती में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
मन के कोने में सिमटी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब सबने मुँह फेर लिया तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

गिरने में कोई हार नहीं चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,सत्य और धर्म की राहों पर जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Girane mein koee haar nahi chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Saty aur dharm ki raahon par jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
आँखों में जो नमी है वो दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब कोई सहारा न बचा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
घायल की गति घायल जाने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
जिसके दिल पर बीत रही रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

गिरने में कोई हार नहीं जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,कर्म की खेती में जो पसीना उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Girane mein koee haar nahi jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Karm ki khetee mein jo paseenaa use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
दिल का आईना जब टूटा पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
उम्र भर का सफ़र और सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म के मारों की बस्ती में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब धैर्य की सीमा टूट गई अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
टूटे दिल की ख़ामोशी में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

धैर्य और संतोष का धन जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन की सच्ची पूँजी वही पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Dhairy aur santosh ka dhan jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jeevan ki sachchee poonjee vahee paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
अकेलेपन की धूप जब साए जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म के मारों की बस्ती में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
About Farhat Ehsas (फ़रहत एहसास) — The Maestro of Human Emotion
Farhat Ehsas was an illustrious figure in Modern Sufi Thinker & Master Lyricist (Born 1952), renowned for Tasawwuf aur Adab studies, Rekhta critical editions.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Farhat Ehsas pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Born 1952, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Farhat Ehsas captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Farhat Ehsas's Poetry Resonates Across Generations
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Who was Farhat Ehsas?
Farhat Ehsas was a renowned Modern Sufi Thinker & Master Lyricist (Born 1952) from Bahraich, Uttar Pradesh, India, widely celebrated for MODERN SUFI POET, JAMIA MILLIA ISLAMIA SCHOLAR, EDITORIAL PILLAR OF REKHTA.
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The central philosophy of Farhat Ehsas centers around Modern Sufism, psychological exploration of the self, cosmic illusion of worldly existence, linguistic finesse, leaving timeless guidance for humanity.
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