कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
Dinabandhu Mitra (दीनबंधु मित्र)
Dinabandhu Mitra was a distinguished Indigo Rebel Dramatist representing the Bengali/Dramatic Protest tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
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‘कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।’— Dinabandhu Mitra
Sher #1 • Classic Couplet
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।’— Dinabandhu Mitra
Sher #2 • Passionate Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।’— Dinabandhu Mitra
Sher #3 • Soulful Couplet
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,
Immortal Couplets & Ghazals
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दीनबंधु मित्र कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

दीनबंधु मित्र कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दीनबंधु मित्र कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दीनबंधु मित्र कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

दीनबंधु मित्र कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

दीनबंधु मित्र कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
About Dinabandhu Mitra (दीनबंधु मित्र) — The Maestro of Human Emotion
Dinabandhu Mitra was a distinguished Indigo Rebel Dramatist representing the Bengali/Dramatic Protest tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Dinabandhu Mitra pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Bengali/Dramatic Protest (1830–1873), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Dinabandhu Mitra captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Dinabandhu Mitra's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Dinabandhu Mitra effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Dinabandhu Mitra
Authentic answers about Dinabandhu Mitra's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Dinabandhu Mitra and what was their literary significance?
Dinabandhu Mitra (1830–1873) was a monumental figure in Bengali/Dramatic Protest literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Dinabandhu Mitra's poetry?
The core themes across Dinabandhu Mitra's oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Dinabandhu Mitra's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Dinabandhu Mitra?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Dinabandhu Mitra's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Dinabandhu Mitra?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Dinabandhu Mitra's poetry?
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Where is Dinabandhu Mitra's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Dinabandhu Mitra stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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