सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Dharmavir Bharati (धर्मवीर भारती)
Dharmavir Bharati was an illustrious figure in Literary Titan & Editor of Dharmayug (1926–1997), renowned for Gunahon Ka Devta, Andha Yug (Verse Play on Mahabharata aftermath).

सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— DHARMAVIR BHARATI • 1926–1997

सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— DHARMAVIR BHARATI • 1926–1997
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‘सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— Dharmavir Bharati
Sher #1 • Classic Couplet
सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— Dharmavir Bharati
Sher #2 • Passionate Verse
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— Dharmavir Bharati
Sher #3 • Soulful Couplet
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Dharmavir Bharati
Sher #4 • Philosophical Verse
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,
Immortal Couplets & Ghazals
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem binaa sab soonaa jag mein doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Prem ki is paavan ghaatee mein naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,शांति और संतोष का धन जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मन के मैल को जिसने धोया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem ki mastee mein jo jhoomaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
साधु-संगत की छाया में जो सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य वचन जो मुख से बोले के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Teri aankhon ki jheel mein jo tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Prem nagar ka vaasee banakar jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हृदय में जिसके दया बसी है रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

घायल की गति घायल जाने जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Andheree raat ke sannaate mein keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नदिया की धारा बहती जावे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Aankhon ke aansoo jab sookhe antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab aashaa ki har kiran bujhee manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
वाणी वही जो घाव भरे और सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

घायल की गति घायल जाने कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Jab apanon ne hi diye zakhm to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
नाम और दौलत तो माटी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,परहित में जिसने जीवन सौंपा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

ठोकर खाकर जो संभलता सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Thokar khaakar jo sanbhalataa saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
साधु-संगत की छाया में जो रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,नेकी की राह पे जो जन अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,माटी के इस पुतले में जब मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Maatee ke is putale mein jab manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
साधु-संगत की छाया में जो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,भवसागर की लहरों से जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Karmanyataa ka paavan vrat lekar tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

जो भीतर झाँक के देखता बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,शाश्वत सत्य की इस पावन वेदी पर जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Shaashvat saty ki is paavan vedee par jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
तेरी याद का पावन साया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,मन मंदिर की पावन आरती प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

अहंकार की दीवारें जब अंतर एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Ahankaar ki deevaaren jab antar ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने प्रेम का मर्म समझ प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब परमात्मा की आवाज़ सुनाई दे वही सच्चा उपदेश है जो मोक्ष का द्वार खोलता है,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Antarman ke sannaate mein jab paramaatmaa ki aavaaz sunaaee de vahee sachchaa upadesh hai jo moksh ka dvaar kholataa hai,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Hriday mein jisake dayaa basee hai jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अंतर में जब प्रेम समाया एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम बिना सब सूना जग में संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

कर्म की खेती जो जन बोवे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Karm ki khetee jo jan bove to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Saty vachan jo mukh se bole usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,मन मंदिर की पावन आरती जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Bhavasaagar ki laharon se jo jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Santan ki sangati mein aakar ramaa rahe har dam use sansaar ki koee chintaa kabhee sataa nahi sakatee,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
तेरे मिलन की आस में बीते डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के चरणों में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

प्रेम बिना सब सूना जग में संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Prem binaa sab soonaa jag mein sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Saanson ke har taar pe jisakaa motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
तेरे दीदार की एक झलक ने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जब से नैना रूप में उलझे संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरी आँखों की झील में जो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Saanson ki saragam mein ghul gaya se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Saanson ke har taar pe jisakaa jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
फासले मिट गए जब दिल से से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने प्रेम का मर्म समझ सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Prem binaa sab soonaa jag mein do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Priyatam ke rang mein rang kar jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
मन की वीणा बज उठी जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

जिसके दिल पर बीत रही हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Jisake dil par beet rahi hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Toote hue sapanon ki kirachen keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
ग़म का मारा पंछी जैसे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म के मारों की बस्ती में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
टूटी नाव भँवर में फँसी पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,आँसुओं की इस भाषा को तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

ग़म की तपती दुपहरी में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब सबने मुँह फेर लिया तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Gham ki tapatee dupaharee mein dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jab sabane munh pher liyaa tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
तन्हाई के अँधियारे में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
घायल की गति घायल जाने जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
घायल की गति घायल जाने हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब सबने मुँह फेर लिया तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

आशा का दीप जब बुझने और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस गहरी रात में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Aashaa ka deep jab bujhane aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Gham ki is gaharee raat mein zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
भीतर-भीतर घुटता जाए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब सबने मुँह फेर लिया सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ग़म की तपती दुपहरी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,टूटे दिल की इस वीणा से मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,अंधेरी रात के सन्नाटे में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
तन्हाई के अँधियारे में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

जीवन की इस रणभूमि में अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जीवन का असली आनंद वही उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jeevan ka asalee aanand vahee usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
जिसके दिल पर बीत रही हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
सपनों के महल जब टूटे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,इस दर्द भरे दिल की सदा अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
मन के कोने में सिमटी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,अकेलेपन की इस राह पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
नैनों से जो नीर बहे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे दिल की इस वीणा से तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

अहंकार की दीवारें जब धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Ahankaar ki deevaaren jab dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
ग़म की तपती दुपहरी में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म के मारों की बस्ती में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
अकेलेपन की धूप जब साए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
कोई न अपना इस जग में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई सहारा न बचा केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,कर्म की खेती में जो पसीना है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Zindagi aur kuchh nahi bas usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Karm ki khetee mein jo paseenaa hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
आशा का दीप जब बुझने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस आँधी ने जब तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
About Dharmavir Bharati (धर्मवीर भारती) — The Maestro of Human Emotion
Dharmavir Bharati was an illustrious figure in Literary Titan & Editor of Dharmayug (1926–1997), renowned for Gunahon Ka Devta, Andha Yug (Verse Play on Mahabharata aftermath).
Poetic Innovation & Distinct Voice
Dharmavir Bharati pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1926–1997, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Dharmavir Bharati captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Dharmavir Bharati's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Dharmavir Bharati effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Dharmavir Bharati was a renowned Literary Titan & Editor of Dharmayug (1926–1997) from Allahabad, Uttar Pradesh, India, widely celebrated for AUTHOR OF 'GUNAHON KA DEVTA' & 'ANDHA YUG', LEGENDARY EDITOR OF DHARMAYUG, PADMA SHRI.
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The central philosophy of Dharmavir Bharati centers around Complex moral dilemmas, tragedy of war and blind ambition, idealistic versus sensual love, post-war human alienation, leaving timeless guidance for humanity.
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Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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