वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Dayaram (दयाराम)
Dayaram was the last towering titan of medieval Gujarati literature, celebrated as 'Garbi Samrat' for his musical Krishna-bhakti lyrics and passionate Rasik devotion.

वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
— DAYARAM • LATE MEDIEVAL GUJARATI BHAKTI

वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
— DAYARAM • LATE MEDIEVAL GUJARATI BHAKTI
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‘वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— Dayaram
Sher #1 • Classic Couplet
वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— Dayaram
Sher #2 • Passionate Verse
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘वाणी में जो अमृत घोले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— Dayaram
Sher #3 • Soulful Couplet
वाणी में जो अमृत घोले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,
Immortal Couplets & Ghazals
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी में जो अमृत घोले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्य का दीप जब जलता है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Saanson ke har taar pe jisakaa sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
सत्य का दीप जब जलता है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

साँसों की सरगम में घुल गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Saanson ki saragam mein ghul gaya tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Prem ke is paavan teerath mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
कर्म की खेती जो जन बोवे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,नेकी की राह पे जो जन जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्य के पावन पथ पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह का हर इक आँसू बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Prem ki doree baandh laee jab haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Virah ka har ik aansoo banakar motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,शांति और संतोष का धन जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,भवसागर की लहरों से जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

अकेलेपन की धूप जब साए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Akelepan ki dhoop jab saae kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Dard ki bhattee mein tapakar hi tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
अहंकार की दीवारें जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
साधु-संगत की छाया में जो सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

सपनों के महल जब टूटे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Sapanon ke mahal jab toote antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हरि की कृपा का पावन साया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,माटी का चोला पाकर जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य-अहिंसा की राहों पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दिल के फफोलों को देखकर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Toote dil ki khaamoshi mein hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Dil ke phapholon ko dekhakar tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मन के मैल को जिसने धोया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

कर्म की पावन वेदी पर चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जीवन की सच्ची पूँजी वही जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Karm ki paavan vedee par chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jeevan ki sachchee poonjee vahee jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
नाम और दौलत तो माटी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

धैर्य और संतोष का धन जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,कर्म की खेती में जो पसीना चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Dhairy aur santosh ka dhan jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Karm ki khetee mein jo paseenaa chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,नेकी की राह पे जो जन अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

माटी का यह चोला पाकर हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,माटी के इस पुतले में जब और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Maatee ka yeh cholaa paakar hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Maatee ke is putale mein jab aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्संग की निर्मल गंगा में रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

संतन की संगति में आकर पार उतरना हो तो हरि नाम की पावन नौका का आश्रय लेना पड़ता है,ब्रह्मलीन होकर जो जन स्थित का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Santan ki sangati mein aakar paar utaranaa ho to hari naam ki paavan naukaa ka aashray lenaa padta hai,Brahmaleen hokar jo jan sthit ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

अहंकार की दीवारें जब अंतर है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं तब आत्मा अनादि और अनंत काल के पार शाश्वत धाम में पहुँच गई।
Ahankaar ki deevaaren jab antar hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jab man ki sab tarangen shaant hueen tab aatmaa anaadi aur anant kaal ke paar shaashvat dhaam mein pahunch gayi.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी आँखों की झील में जो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

माटी का यह देह बना उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Maatee ka yeh deh banaa usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,हृदय के पावन सिंहासन पर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Jo toofaanon mein apanee naav antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,साँसों के हर तार पे जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
साँसों की सरगम में घुल गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Santan ki sangati mein aakar amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Saty vachan jo mukh se bole use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम की चाहत में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Satkarmon ki amit jyoti jab to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
साँसों की सरगम में घुल गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे मिलन की आस में बीते तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Karm ki khetee jo jan bove prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Man ke mail ko jisane dhoyaa ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह का हर इक आँसू बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
अंतर घट में जब ज्योति जगी रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Prem binaa sab soonaa jag mein amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Man mandir ki paavan aaratee to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
मन मंदिर में बसा जो मूरति रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Teri yaad ka paavan saaya priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह का हर इक आँसू बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम सुधा का रस जो चखा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,सच्चे प्रेम की यही निशानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

प्रेम बिना सब सूना जग में अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Prem binaa sab soonaa jag mein amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Prem ki is paavan ghaatee mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Waqt ke thaperon ne hamen par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Is dard bhare dil ki sadaa paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह का हर इक आँसू बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन के कोने में सिमटी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
टूटे दिल की ख़ामोशी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

भीतर-भीतर घुटता जाए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब धैर्य की सीमा टूट गई ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jab dhairy ki seemaa toot gayi zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
विरह की अगन में जलता मन को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
कोई न अपना इस जग में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
अकेलेपन की धूप जब साए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
छाले पड़े हैं पाँवों में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब कोई सहारा न बचा जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

विरह की अगन में जलता मन रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,अंधेरी रात के सन्नाटे में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Virah ki agan mein jalataa man ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Andheree raat ke sannaate mein tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
सांस-सांस में याद तुम्हारी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब सबने मुँह फेर लिया धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
सांस-सांस में याद तुम्हारी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
विरह की अगन में जलता मन जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अकेलेपन की इस राह पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
सपनों के महल जब टूटे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

गिरने में कोई हार नहीं करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन के इस महासमर में मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Girane mein koee haar nahi karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Jeevan ke is mahaasamar mein manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
आँखों के आँसू जब सूखे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
सांस-सांस में याद तुम्हारी पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

वाणी में जो अमृत घोले अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जीवन की सच्ची पूँजी वही अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Vaanee mein jo amrit ghole agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jeevan ki sachchee poonjee vahee apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
उम्र भर का सफ़र और दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब सबने मुँह फेर लिया तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
आशा का दीप जब बुझने जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब आशा की हर किरण बुझी तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
सपनों के महल जब टूटे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सच्चे मित्र की पहचान यही और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Sachche mitr ki pahachaan yahee aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
आशा का दीप जब बुझने और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,टूटे दिल की इस वीणा से तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
About Dayaram (दयाराम) — The Maestro of Human Emotion
Dayaram was the last towering titan of medieval Gujarati literature, celebrated as 'Garbi Samrat' for his musical Krishna-bhakti lyrics and passionate Rasik devotion.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Dayaram pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Late Medieval Gujarati Bhakti, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Dayaram captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Dayaram's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Dayaram effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Dayaram
Authentic answers about Dayaram's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Dayaram and what was their literary significance?
Dayaram (1777–1853) was a monumental figure in Gujarati/Bhakti literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Dayaram's poetry?
The core themes across Dayaram's oeuvre encompass गरबी छंद का अनुपम संगीत, कृष्ण-गोपी का निश्छल अनुराग, मान-मनौवल और विरह का माधुर्य, पुष्टिमार्गीय भक्ति व आत्मसमर्पण, रूप-सौन्दर्य की मोहिनी छटा, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Dayaram's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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