उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’,सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बाँ की है।
Dagh Dehlvi (दाग़ देहलवी)
Nawab Mirza Khan Dagh Dehlvi was an outstanding Urdu poet of the Delhi school, famed for his musical, idiomatic, and lively ghazals, serving as court poet to the Nizam of Hyderabad.
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‘उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’,सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बाँ की है।’— Dagh Dehlvi
Sher #1 • Classic Couplet
उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’,

‘ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतबार किया,तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया।’— Dagh Dehlvi
Sher #2 • Passionate Verse
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतबार किया,

‘हुस्न और इश्क़ दोनों में फ़र्क़ इतना है सिर्फ़,एक ख़्वाब बन गया एक हक़ीक़त हो गया।’— Dagh Dehlvi
Sher #3 • Soulful Couplet
हुस्न और इश्क़ दोनों में फ़र्क़ इतना है सिर्फ़,
Immortal Couplets & Ghazals
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतबार किया,तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया।
हुस्न और इश्क़ दोनों में फ़र्क़ इतना है सिर्फ़,एक ख़्वाब बन गया एक हक़ीक़त हो गया।
लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद,हाए कम्बख़्त तू ने पी ही नहीं।

आते आते आएगा उन्हें ख़याल,जाते जाते जाएगा दिल का मलाल।
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया,लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद।
लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
जाते जाते जाएगा दिल का मलाल,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।

तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बाँ की है।
मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद।
सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बाँ की है,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
हुस्न और इश्क़ दोनों में फ़र्क़ इतना है सिर्फ़,सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बाँ की है।

हाए कम्बख़्त तू ने पी ही नहीं,लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बाँ की है।
बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद।
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतबार किया,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

एक ख़्वाब बन गया एक हक़ीक़त हो गया,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
आते आते आएगा उन्हें ख़याल,सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बाँ की है।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
About Dagh Dehlvi (दाग़ देहलवी) — The Maestro of Human Emotion
Nawab Mirza Khan Dagh Dehlvi was an outstanding Urdu poet of the Delhi school, famed for his musical, idiomatic, and lively ghazals, serving as court poet to the Nizam of Hyderabad.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Dagh Dehlvi pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Late Mughal & Rampur/Hyderabad Courts, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Dagh Dehlvi captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Dagh Dehlvi's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Dagh Dehlvi effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Dagh Dehlvi
Authentic answers about Dagh Dehlvi's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was the ustad of Allama Iqbal in poetry?
Dagh Dehlvi was the poetic master (ustad) who mentored Allama Iqbal via correspondence.
When and where was Dagh Dehlvi born?
Dagh Dehlvi lived through 1831 to 1905 (Late Mughal & Rampur/Hyderabad Courts).
What makes Dagh Dehlvi's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Dagh Dehlvi?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Dagh Dehlvi's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Dagh Dehlvi?
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