सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
D. R. Bendre (Da Ra Bendre) (द. रा. बेंद्रे)
D. R. Bendre (Da Ra Bendre) was a distinguished Vara Kavi representing the Kannada/Lyric tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
— D. R. BENDRE (DA RA BENDRE) • KANNADA/LYRIC (1896–1981)

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
— D. R. BENDRE (DA RA BENDRE) • KANNADA/LYRIC (1896–1981)
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‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।’— D. R. Bendre (Da Ra Bendre)
Sher #1 • Classic Couplet
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। D. R. Bendre,

‘वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। D. R. Bendre,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।’— D. R. Bendre (Da Ra Bendre)
Sher #2 • Passionate Verse
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। D. R. Bendre,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। D. R. Bendre,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।’— D. R. Bendre (Da Ra Bendre)
Sher #3 • Soulful Couplet
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। D. R. Bendre,
Immortal Couplets & Ghazals
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। D. R. Bendre,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। D. R. Bendre,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। D. R. Bendre,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। D. R. Bendre,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। D. R. Bendre,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। D. R. Bendre,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। D. R. Bendre,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। D. R. Bendre,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। D. R. Bendre,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। D. R. Bendre,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। D. R. Bendre,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। D. R. Bendre,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। D. R. Bendre,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। D. R. Bendre,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। D. R. Bendre,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। D. R. Bendre,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। D. R. Bendre,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। D. R. Bendre,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। D. R. Bendre,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। D. R. Bendre,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। D. R. Bendre,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। D. R. Bendre,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। D. R. Bendre,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। D. R. Bendre,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। D. R. Bendre,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। D. R. Bendre,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। D. R. Bendre,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। D. R. Bendre,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। D. R. Bendre,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। D. R. Bendre,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। D. R. Bendre,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। D. R. Bendre,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। D. R. Bendre,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। D. R. Bendre,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। D. R. Bendre,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। D. R. Bendre,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। D. R. Bendre,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। D. R. Bendre,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। D. R. Bendre,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। D. R. Bendre,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। D. R. Bendre,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। D. R. Bendre,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। D. R. Bendre,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। D. R. Bendre,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। D. R. Bendre,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। D. R. Bendre,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

द. रा. बेंद्रे कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। D. R. Bendre,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
About D. R. Bendre (Da Ra Bendre) (द. रा. बेंद्रे) — The Maestro of Human Emotion
D. R. Bendre (Da Ra Bendre) was a distinguished Vara Kavi representing the Kannada/Lyric tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
D. R. Bendre (Da Ra Bendre) pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Kannada/Lyric (1896–1981), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, D. R. Bendre (Da Ra Bendre) captured the bittersweet beauty of human existence.
Why D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, D. R. Bendre (Da Ra Bendre) effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About D. R. Bendre (Da Ra Bendre)
Authentic answers about D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was D. R. Bendre (Da Ra Bendre) and what was their literary significance?
D. R. Bendre (Da Ra Bendre) (1896–1981) was a monumental figure in Kannada/Lyric literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s poetry?
The core themes across D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of D. R. Bendre (Da Ra Bendre)?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by D. R. Bendre (Da Ra Bendre)?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s poetry?
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Where is D. R. Bendre (Da Ra Bendre)'s memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating D. R. Bendre (Da Ra Bendre) stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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