अहंकार की दीवारें जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Bhawani Prasad Mishra (भवानी प्रसाद मिश्र)
Bhawani Prasad Mishra was an illustrious figure in Poet of Lucid Simplicity & Gandhian Spirit (1913–1985), renowned for Geet Farosh, Buni Hui Rassi.

अहंकार की दीवारें जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— BHAWANI PRASAD MISHRA • 1913–1985

अहंकार की दीवारें जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— BHAWANI PRASAD MISHRA • 1913–1985
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‘अहंकार की दीवारें जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— Bhawani Prasad Mishra
Sher #1 • Classic Couplet
अहंकार की दीवारें जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।’— Bhawani Prasad Mishra
Sher #2 • Passionate Verse
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘मन मंदिर में जो दीप जले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— Bhawani Prasad Mishra
Sher #3 • Soulful Couplet
मन मंदिर में जो दीप जले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Bhawani Prasad Mishra
Sher #4 • Philosophical Verse
दीन-दुखी का आसरा बनकर सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,
Immortal Couplets & Ghazals
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Tere deedaar ki ek jhalak ne doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Aankhon ke raste dil mein utaraa aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,नेकी की राह पे जो जन उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
धरती की छाती पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Nainon ke darpan mein basaa jab dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Saanson ke har taar pe jisakaa jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Prem ki doree baandh laee jab se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Aankhon ke raste dil mein utaraa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,भवसागर की लहरों से जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,मोह-निशा से जो जन जागा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

मन के कोने में सिमटी यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Man ke kone mein simatee yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Waqt ke is kroor prahaar ne tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
संतन की संगति में आकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
अहंकार की दीवारें जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

उम्र भर का सफ़र और रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस गहरी रात में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Umr bhar ka safar aur ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Gham ki is gaharee raat mein paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

ग़म की तपती दुपहरी में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Gham ki tapatee dupaharee mein baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Gham ki is lanbee yaatraa mein akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
नाम और दौलत तो माटी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मोह-निशा से जो जन जागा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

नदी की तरह बहते रहना जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जो सबको अपना मान के चले उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jo sabako apanaa maan ke chale usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,भवसागर की लहरों से जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन का यह पावन सूत्र जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अंत समय जब निकट आएगा विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Ahankaar ki deevaaren jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Ant samay jab nikat aaegaa vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,नेकी की राह पे जो जन वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,शांति और संतोष का धन जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
वाणी में जो अमृत घोले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

धैर्य और संतोष का धन अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,सत्य और धर्म की राहों पर उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Dhairy aur santosh ka dhan agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Saty aur dharm ki raahon par usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

अहंकार की दीवारें जब अंतर बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Ahankaar ki deevaaren jab antar barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम की चाहत में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Santan ki sangati mein aakar prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जब से नैना रूप में उलझे लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,हृदय के पावन सिंहासन पर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

सत्य का दीप जब जलता एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Saty ka deep jab jalataa ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने प्रेम का मर्म समझ मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
साँसों की सरगम में घुल गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Jo toofaanon mein apanee naav man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Prem ki dor mein bandh gaya jo use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
फासले मिट गए जब दिल से जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम नगर का वासी बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के चरणों में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Man ke nirmal darpan mein jab jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Man ke mail ko jisane dhoyaa usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन धारा में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम का दीपक अंतर में जो एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Ahankaar ki deevaaren jab jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Saadhu purush ki vaanee kabhee vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
साँसों की सरगम में घुल गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
फासले मिट गए जब दिल से जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम का दीपक अंतर में जो प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Roma-rom mein ram gaya preetam ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Aankhon ke raste dil mein utaraa naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
फासले मिट गए जब दिल से से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Teri aankhon ki jheel mein jo barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Saanson ke har taar pe jisakaa jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के चरणों में जिसने एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Jisane prem ka marm samajh ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम का दीपक अंतर में जो नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

दिल का आईना जब टूटा जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Dil ka aaina jab tootaa jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Andheree raat ke sannaate mein tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जब से नैना रूप में उलझे मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
टूटी नाव भँवर में फँसी हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब आशा की हर किरण बुझी तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

ग़म की तपती दुपहरी में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Gham ki tapatee dupaharee mein aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jab dhairy ki seemaa toot gayi keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब कोई चारासाज़ न मिला मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
ग़म की तपती दुपहरी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म की इस गहरी रात में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
मन के कोने में सिमटी यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,इस दर्द भरे दिल की सदा कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

सपनों के महल जब टूटे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस गहरी रात में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Sapanon ke mahal jab toote hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Gham ki is gaharee raat mein tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
घायल की गति घायल जाने जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अंधेरी रात के सन्नाटे में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस लंबी यात्रा में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
वक़्त की आँधी ने तोड़े को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
आँखों में जो नमी है वो किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

धरती की छाती पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य और धर्म की राहों पर सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Saty aur dharm ki raahon par saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
दिल का आईना जब टूटा जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
आँखों के आँसू जब सूखे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द का यह गहरा सागर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

धैर्य और संतोष का धन सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जीवन का असली आनंद वही और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Dhairy aur santosh ka dhan saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jeevan ka asalee aanand vahee aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
टूटी नाव भँवर में फँसी चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
उम्र भर का सफ़र और हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अकेलेपन की इस राह पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
सांस-सांस में याद तुम्हारी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द का यह गहरा सागर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
उम्र भर का सफ़र और रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस गहरी रात में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

चंद साँसों की मोहलत में धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Chand saanson ki mohalat mein dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Karmanyataa ka paavan vrat lekar chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
ग़म का मारा पंछी जैसे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब सबने मुँह फेर लिया तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
About Bhawani Prasad Mishra (भवानी प्रसाद मिश्र) — The Maestro of Human Emotion
Bhawani Prasad Mishra was an illustrious figure in Poet of Lucid Simplicity & Gandhian Spirit (1913–1985), renowned for Geet Farosh, Buni Hui Rassi.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Bhawani Prasad Mishra pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1913–1985, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Bhawani Prasad Mishra captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Bhawani Prasad Mishra's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Bhawani Prasad Mishra effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Bhawani Prasad Mishra
Authentic answers about Bhawani Prasad Mishra's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Bhawani Prasad Mishra?
Bhawani Prasad Mishra was a renowned Poet of Lucid Simplicity & Gandhian Spirit (1913–1985) from Tigariya, Hoshangabad, Madhya Pradesh, widely celebrated for BHAVANI BHAI, POET OF 'GEET FAROSH', MASTER OF CONVERSATIONAL HINDI POETRY, SAHITYA AKADEMI LAUREATE.
What is the central philosophy and message of Bhawani Prasad Mishra?
The central philosophy of Bhawani Prasad Mishra centers around Gandhian non-violence, conversational lyricism, poignant familial longing in prison, deep communion with nature, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Bhawani Prasad Mishra's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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