आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
Bharathidasan (Kanakasubburathinam) (भारतीदासन)
Bharathidasan (Kanakasubburathinam) was a distinguished Puratchi Kavi representing the Tamil/Rebel tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
— BHARATHIDASAN (KANAKASUBBURATHINAM) • TAMIL/REBEL (1891–1964)

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
— BHARATHIDASAN (KANAKASUBBURATHINAM) • TAMIL/REBEL (1891–1964)
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।’— Bharathidasan (Kanakasubburathinam)
Sher #1 • Classic Couplet
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Bharathidasan,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।’— Bharathidasan (Kanakasubburathinam)
Sher #2 • Passionate Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Bharathidasan,

‘भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।’— Bharathidasan (Kanakasubburathinam)
Sher #3 • Soulful Couplet
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,
Immortal Couplets & Ghazals
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Bharathidasan,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Bharathidasan,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Bharathidasan,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Bharathidasan,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Bharathidasan,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Bharathidasan,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Bharathidasan,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Bharathidasan,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Bharathidasan,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Bharathidasan,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Bharathidasan,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Bharathidasan,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Bharathidasan,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Bharathidasan,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Bharathidasan,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Bharathidasan,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Bharathidasan,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Bharathidasan,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Bharathidasan,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Bharathidasan,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Bharathidasan,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Bharathidasan,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Bharathidasan,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Bharathidasan,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Bharathidasan,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Bharathidasan,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Bharathidasan,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Bharathidasan,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Bharathidasan,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Bharathidasan,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Bharathidasan,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Bharathidasan,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Bharathidasan,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Bharathidasan,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Bharathidasan,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Bharathidasan,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Bharathidasan,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Bharathidasan,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

भारतीदासन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
About Bharathidasan (Kanakasubburathinam) (भारतीदासन) — The Maestro of Human Emotion
Bharathidasan (Kanakasubburathinam) was a distinguished Puratchi Kavi representing the Tamil/Rebel tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Bharathidasan (Kanakasubburathinam) pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Tamil/Rebel (1891–1964), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Bharathidasan (Kanakasubburathinam) captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Bharathidasan (Kanakasubburathinam) effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Bharathidasan (Kanakasubburathinam)
Authentic answers about Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Bharathidasan (Kanakasubburathinam) and what was their literary significance?
Bharathidasan (Kanakasubburathinam) (1891–1964) was a monumental figure in Tamil/Rebel literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s poetry?
The core themes across Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Bharathidasan (Kanakasubburathinam)?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Bharathidasan (Kanakasubburathinam)?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s poetry?
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Where is Bharathidasan (Kanakasubburathinam)'s memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Bharathidasan (Kanakasubburathinam) stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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