माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Bhagwati Charan Varma (भगवती चरण वर्मा)
Bhagwati Charan Varma was an illustrious figure in Master Novelist & Creator of Chitralekha (1903–1981), renowned for Chitralekha (Philosophical debate on sin and virtue), Bhoole Bisre Chitra.

माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
— BHAGWATI CHARAN VARMA • 1903–1981

माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
— BHAGWATI CHARAN VARMA • 1903–1981
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‘माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— Bhagwati Charan Varma
Sher #1 • Classic Couplet
माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,

‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— Bhagwati Charan Varma
Sher #2 • Passionate Verse
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,

‘अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— Bhagwati Charan Varma
Sher #3 • Soulful Couplet
अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,
Immortal Couplets & Ghazals
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

मन की वीणा बज उठी जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Man ki veenaa baj uthee jab barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem ki mastee mein jo jhoomaa usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Prem rang mein jo rang gaya tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Prem nagar ka vaasee banakar yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
वाणी में जो अमृत घोले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,शांति और संतोष का धन जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
साधु-संगत की छाया में जो मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अहंकार का त्याग किया जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

प्रेम गली अति साँकरी जामें का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Prem galee ati saankaree jaamen ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ki mastee mein jo jhoomaa ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नदिया की धारा बहती जावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

दिल का आईना जब टूटा जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,अंधेरी रात के सन्नाटे में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Dil ka aaina jab tootaa jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Andheree raat ke sannaate mein akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

तन्हाई के अँधियारे में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Tanhaaee ke andhiyaare mein antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Dard ki bhattee mein tapakar hi keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
नदिया की धारा बहती जावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

ग़म की तपती दुपहरी में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Gham ki tapatee dupaharee mein ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Andheree raat ke sannaate mein keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सत्य का दीप जब जलता है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

नेकी की राह पे जो जन जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,समय की अमूल्य बूँदों को उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Nekee ki raah pe jo jan jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Samay ki amooly boondon ko usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,नेकी की राह पे जो जन के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

अहंकार की दीवारें जब चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,मेहनत और लगन से जिसने अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Ahankaar ki deevaaren jab chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Mehanat aur lagan se jisane apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
वाणी में जो अमृत घोले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य वचन जो मुख से बोले अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जो अपने वचन का पक्का है है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Zindagi aur kuchh nahi bas mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jo apane vachan ka pakkaa hai hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

भवसागर की लहरों से जो बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Bhavasaagar ki laharon se jo barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
तेरी याद का पावन साया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के चरणों में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,सच्चे प्रेम की यही निशानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रियतम की याद में जो नैना संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

आत्मा अजर-अमर अविनाशी है जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Aatmaa ajara-amar avinaashee hai jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
साँसों की सरगम में घुल गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन की वीणा बज उठी जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Mrityu koee ant nahi bas hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Jab man ki sab tarangen shaant hueen use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
नैन मिले जब नैनन से तब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
तेरे रूप की पावन झांकी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम का दीपक अंतर में जो मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम सुधा का रस जो चखा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Sataguru mile to raah dikhaave amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Saty vachan jo mukh se bole apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह की रात जब ढलने लगी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम का दीपक अंतर में जो कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे मिलन की आस में बीते अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

सत्य का दीप जब जलता है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Saty ka deep jab jalataa hai prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Dhairy ka daaman jisane thaame apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन घाटी में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह का हर इक आँसू बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Saanson ki saragam mein ghul gaya to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Prem ki paavan jyoti jagaaee jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अमर प्रेम की अमर कहानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Prem rang mein jo rang gaya jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Priyatam ke rang mein rang kar man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम गली अति साँकरी जामें का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे रूप की पावन झांकी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे रूप की पावन झांकी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Nainan aage too hi too naache dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Saanson ke har taar pe jisakaa sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह का हर इक आँसू बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रियतम की याद में जो नैना जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

भीतर-भीतर घुटता जाए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Zindagi ki is soonee dagar par chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
प्रियतम की याद में जो नैना डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
भीतर-भीतर घुटता जाए कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
अकेलेपन की धूप जब साए जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म के मारों की बस्ती में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

कोई न अपना इस जग में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अकेलेपन की इस राह पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Koee na apanaa is jag mein lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Akelepan ki is raah par tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
आँखों के आँसू जब सूखे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,दर्द की भट्टी में तपकर ही तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अकेलेपन की इस राह पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
दिल का आईना जब टूटा जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,अंधेरी रात के सन्नाटे में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
सांस-सांस में याद तुम्हारी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

अकेलेपन की धूप जब साए दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,आँसुओं की इस भाषा को सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Akelepan ki dhoop jab saae doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Aansuon ki is bhaashaa ko sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
वक़्त की आँधी ने तोड़े सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
अकेलेपन की धूप जब साए भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म की इस गहरी रात में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दिल का आईना जब टूटा हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
दिल का आईना जब टूटा भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,टूटे दिल की इस वीणा से तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अंत समय जब निकट आएगा उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Ant samay jab nikat aaegaa use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
घायल की गति घायल जाने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
दर्द की रात में जब कोई भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म की इस आँधी ने जब सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

धैर्य और संतोष का धन जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,धैर्य की नौका पर सवार होकर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Dhairy aur santosh ka dhan jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
घायल की गति घायल जाने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,इस दर्द भरे दिल की सदा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
कोई न अपना इस जग में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दर्द की भट्टी में तपकर ही सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दिल का आईना जब टूटा हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
तन्हाई के अँधियारे में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

जीवन की इस रणभूमि में तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,अंत समय जब निकट आएगा अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Jeevan ki is ranabhoomi mein tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Ant samay jab nikat aaegaa apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
अकेलेपन की धूप जब साए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,अकेलेपन की इस राह पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
About Bhagwati Charan Varma (भगवती चरण वर्मा) — The Maestro of Human Emotion
Bhagwati Charan Varma was an illustrious figure in Master Novelist & Creator of Chitralekha (1903–1981), renowned for Chitralekha (Philosophical debate on sin and virtue), Bhoole Bisre Chitra.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Bhagwati Charan Varma pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1903–1981, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Bhagwati Charan Varma captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Bhagwati Charan Varma's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Bhagwati Charan Varma effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Bhagwati Charan Varma
Authentic answers about Bhagwati Charan Varma's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Bhagwati Charan Varma?
Bhagwati Charan Varma was a renowned Master Novelist & Creator of Chitralekha (1903–1981) from Shafiypur, Unnao, Uttar Pradesh, India, widely celebrated for AUTHOR OF 'CHITRALEKHA' & 'BHOOLE BISRE CHITRA', PADMA BHUSHAN, SAHITYA AKADEMI AWARDEE.
What is the central philosophy and message of Bhagwati Charan Varma?
The central philosophy of Bhagwati Charan Varma centers around Relativity of sin and virtue (Paap aur Punya), human destiny vs circumstance, philosophical depth in engaging narrative, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Bhagwati Charan Varma's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Bhagwati Charan Varma?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Bhagwati Charan Varma's impact on literary culture?
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