मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Shaheed Bhagat Singh (शहीद भगत सिंह)
Shaheed Bhagat Singh was an illustrious figure in Revolutionary Thinker & Freedom Icon (1907–1931), renowned for Why I Am an Atheist, Letter to Young Political Workers.

मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
— SHAHEED BHAGAT SINGH • 1907–1931

मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
— SHAHEED BHAGAT SINGH • 1907–1931
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‘मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— Shaheed Bhagat Singh
Sher #1 • Classic Couplet
मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,

‘नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— Shaheed Bhagat Singh
Sher #2 • Passionate Verse
नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— Shaheed Bhagat Singh
Sher #3 • Soulful Couplet
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,
Immortal Couplets & Ghazals
नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Nainan aage too hi too naache raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Prem nagar ka vaasee banakar jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Priyatam ka anuraag hi jisakaa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,वाणी में जिसके मिठास घुली व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,शांति और संतोष का धन जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

फासले मिट गए जब दिल से दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Phaasale mit gaye jab dil se do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Prem ki paavan jyoti jagaaee yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,धैर्य का दामन जिसने थामे लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हृदय में जिसके दया बसी है उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,आँसुओं की इस भाषा को अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Sapanon ke mahal jab toote dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Aansuon ki is bhaashaa ko arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,माटी का चोला पाकर जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे हुए दिल का दर्द केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Zakhm wo nahi jo jism jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Toote hue dil ka dard keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,नेकी की राह पे जो जन निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अकेलेपन की इस राह पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Virah ki agan mein jalataa man lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Akelepan ki is raah par keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,धैर्य का दामन जिसने थामे वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

हौसलों के तरकश में जब धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,हृदय में जिसके दया और करुणा जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Hausalon ke tarakash mein jab dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,साधु पुरुष की वाणी कभी रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,माटी के इस पुतले में जब जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Maatee ke is putale mein jab jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
आशा तृष्णा सब छूटी जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

मन मंदिर में जो दीप धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,माटी के इस पुतले में जब है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Man mandir mein jo deep dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Maatee ke is putale mein jab hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,नेकी की राह पे जो जन जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सदाचार की पावन वेदी पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

पानी केरा बुदबुदा अस प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Paani keraa budabudaa as prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
नदिया की धारा बहती जावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह का हर इक आँसू बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

अमृत की बूँद अंतर में जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Amrit ki boond antar mein jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Jab man ki sab tarangen shaant hueen jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैनों के दर्पण में बसा जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैनन आगे तू ही तू नाचे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

अमृत की बूँद अंतर में में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Amrit ki boond antar mein mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
तेरी याद का पावन साया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Naam aur daulat to maatee ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Vaanee mein jisake mithaas ghulee woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जब से नैना रूप में उलझे युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
मन की वीणा बज उठी जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Moha-nishaa se jo jan jaagaa rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अंतर में जब प्रेम समाया एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

नदिया की धारा बहती जावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Dhairy ka daaman jisane thaame use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
नैन मिले जब नैनन से तब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के चरणों में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन धारा में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

मन की वीणा बज उठी जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Man ki veenaa baj uthee jab tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Prem ki mastee mein jo jhoomaa jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे दीदार की एक झलक ने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Nainon ke darpan mein basaa jab raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Sachche aashiq ki pahachaan yahee ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम के इस पावन तीरथ में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
फासले मिट गए जब दिल से दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन की वीणा बज उठी जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem ki doree baandh laee jab antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem ki paavan jyoti jagaaee use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,साँसों के हर तार पे जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

आशा का दीप जब बुझने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब नयनों के सब आँसू सूखे ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Aashaa ka deep jab bujhane sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
अकेलेपन की धूप जब साए जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
नैनों से जो नीर बहे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अकेलेपन की इस राह पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Virah ki agan mein jalataa man lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Akelepan ki is raah par tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस लंबी यात्रा में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आशा का दीप जब बुझने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म के मारों की बस्ती में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,आँसुओं की इस भाषा को अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दिल का आईना जब टूटा अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

नैनों से जो नीर बहे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Nainon se jo neer bahe jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Gham ki is gaharee raat mein tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
छाले पड़े हैं पाँवों में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे हुए दिल का दर्द मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
दिल का आईना जब टूटा सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दिल के फफोलों को देखकर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
तन्हाई के अँधियारे में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,आँसुओं की इस भाषा को मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

कर्म की पावन वेदी पर जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,त्याग और सेवा की भावना से विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Karm ki paavan vedee par jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
आशा का दीप जब बुझने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब नयनों के सब आँसू सूखे ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
विरह की अगन में जलता मन पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द का यह गहरा सागर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
सपनों के महल जब टूटे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
ग़म का मारा पंछी जैसे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब कोई सहारा न बचा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

नेकी की राह पे जो जन मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,धैर्य की नौका पर सवार होकर वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Nekee ki raah pe jo jan mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Dhairy ki naukaa par savaar hokar woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
टूटी नाव भँवर में फँसी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
नैनों से जो नीर बहे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब कोई सहारा न बचा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे हुए दिल का दर्द केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

जीवन का यह कठिन सफ़र जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,हृदय में जिसके दया और करुणा चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Jeevan ka yeh kathin safar jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
ग़म की तपती दुपहरी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
About Shaheed Bhagat Singh (शहीद भगत सिंह) — The Maestro of Human Emotion
Shaheed Bhagat Singh was an illustrious figure in Revolutionary Thinker & Freedom Icon (1907–1931), renowned for Why I Am an Atheist, Letter to Young Political Workers.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Shaheed Bhagat Singh pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1907–1931, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Shaheed Bhagat Singh captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Shaheed Bhagat Singh's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Shaheed Bhagat Singh effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Shaheed Bhagat Singh
Authentic answers about Shaheed Bhagat Singh's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Shaheed Bhagat Singh?
Shaheed Bhagat Singh was a renowned Revolutionary Thinker & Freedom Icon (1907–1931) from Banga, Lyallpur (now Pakistan), widely celebrated for SHAHEED-E-AZAM, IDEOLOGICAL PIONEER OF HSRA, YOUTH REVOLUTIONARY ICON.
What is the central philosophy and message of Shaheed Bhagat Singh?
The central philosophy of Shaheed Bhagat Singh centers around Socialist revolution, intellectual awakening, anti-imperialism, critical questioning of superstition, supreme sacrifice, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Shaheed Bhagat Singh's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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