माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Bertrand Russell (बर्ट्रेंड रसेल)
Bertrand Russell was an illustrious figure in Philosopher, Mathematician & Nobel Laureate (1872–1970), renowned for A History of Western Philosophy, The Conquest of Happiness.

माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
— BERTRAND RUSSELL • 1872–1970

माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
— BERTRAND RUSSELL • 1872–1970
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‘माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— Bertrand Russell
Sher #1 • Classic Couplet
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Bertrand Russell
Sher #2 • Passionate Verse
सतगुरु मिले तो राह दिखावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Bertrand Russell
Sher #3 • Soulful Couplet
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,
Immortal Couplets & Ghazals
सतगुरु मिले तो राह दिखावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हृदय में जिसके दया बसी है रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम के इस पावन तीरथ में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Prem ki doree baandh laee jab barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem ke is paavan teerath mein man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

तेरे रूप की पावन झांकी सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Tere roop ki paavan jhaankee sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Amar prem ki amar kahaanee jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
मन मंदिर में जो दीप जले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,परहित में जिसने जीवन सौंपा अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सदाचार की पावन वेदी पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम नगर का वासी बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem binaa sab soonaa jag mein do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Prem nagar ka vaasee banakar sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नदिया की धारा बहती जावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

दिल का आईना जब टूटा हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Dil ka aaina jab tootaa hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Is dard bhare dil ki sadaa sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Tanhaaee ke andhiyaare mein sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Toote hue sapanon ki kirachen paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

उम्र भर का सफ़र और किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस लंबी यात्रा में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Umr bhar ka safar aur kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Gham ki is lanbee yaatraa mein arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हरि की कृपा का पावन साया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हरि की कृपा का पावन साया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

वाणी में जो अमृत घोले उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,संतोषी सदा सुखी रहता है तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Vaanee mein jo amrit ghole usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
सत्य के पावन पथ पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,शांति और संतोष का धन जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,मोह-निशा से जो जन जागा अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

चंद साँसों की मोहलत में हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Chand saanson ki mohalat mein hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सदाचार की पावन वेदी पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,शांति और संतोष का धन जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

जीवन की इस रणभूमि में जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,जो सबको अपना मान के चले है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Jo sabako apanaa maan ke chale hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
मन मंदिर में जो दीप जले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
संतन की संगति में आकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
कर्म की खेती जो जन बोवे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

जो बाहर ढूँढता रहा वो इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Jo baahar dhoondhataa raha wo ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

अमृत की बूँद अंतर में उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Amrit ki boond antar mein umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
इश्क़ जब रूह में उतरता है डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैन मिले जब नैनन से तब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम की चाहत में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम के इस पावन तीरथ में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,परम पद की प्राप्ति उसी को होती त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Antarman ke sannaate mein jab vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Param pad ki praapti usee ko hotee tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी आँखों की झील में जो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Sataguru mile to raah dikhaave maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के चरणों में जिसने एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे रूप की पावन झांकी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जब से नैना रूप में उलझे और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Satya-ahinsaa ki raahon par usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हरि की कृपा का पावन साया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Santan ki sangati mein aakar bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Hari ki kripaa ka paavan saaya usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
तेरे रूप की पावन झांकी सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
फासले मिट गए जब दिल से तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन घाटी में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरे रूप की पावन झांकी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Naam aur daulat to maatee saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
फासले मिट गए जब दिल से दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रियतम की याद में जो नैना पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम सुधा का रस जो चखा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी आँखों की झील में जो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के चरणों में जिसने एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Ishq ki raah anokhee bande do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Priyatam ke charanon mein jisane ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम का दीपक अंतर में जो तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में बसा जो मूरति अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रियतम की याद में जो नैना बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम सुधा का रस जो चखा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
बिरहा की आग में तप के कुंदन तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे प्रेम की यही निशानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम नगर का वासी बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रियतम की याद में जो नैना रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अमर प्रेम की अमर कहानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Saanson ki saragam mein ghul gaya se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Amar prem ki amar kahaanee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
तेरी आँखों की झील में जो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में बसा जो मूरति प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अमर प्रेम की अमर कहानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

दिल का आईना जब टूटा रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई चारासाज़ न मिला अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Dil ka aaina jab tootaa ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Jab koee chaaraasaaz na mila arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
साँसों की सरगम में घुल गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के चरणों में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तन्हाई के अँधियारे में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब कोई सहारा न बचा तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस आँधी ने जब सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

आँखों में जो नमी है वो कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म के मारों की बस्ती में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Aankhon mein jo namee hai wo koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Gham ke maaron ki bastee mein pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
वक़्त की आँधी ने तोड़े बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
दिल का आईना जब टूटा हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
दर्द की रात में जब कोई को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

अकेलेपन की धूप जब साए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,टूटे हुए सपनों की किरचें पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Akelepan ki dhoop jab saae aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Toote hue sapanon ki kirachen paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस आँधी ने जब केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
आँखों में जो नमी है वो सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब आशा की हर किरण बुझी पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आशा का दीप जब बुझने जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
घायल की गति घायल जाने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब आशा की हर किरण बुझी ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

धरती की छाती पर जिसने जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,जो अपने वचन का पक्का है विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Jo apane vachan ka pakkaa hai vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
दिल का आईना जब टूटा रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई चारासाज़ न मिला अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब सबने मुँह फेर लिया तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
सपनों के महल जब टूटे सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे हुए दिल का दर्द सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब आशा की हर किरण बुझी जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

अहंकार की दीवारें जब अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Ahankaar ki deevaaren jab agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Karmanyataa ka paavan vrat lekar chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
नैनों से जो नीर बहे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
टूटी नाव भँवर में फँसी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
दर्द की रात में जब कोई हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब सबने मुँह फेर लिया तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

कर्म की पावन वेदी पर जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का असली आनंद वही उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Karm ki paavan vedee par jale to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Jeevan ka asalee aanand vahee usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
तन्हाई के अँधियारे में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
About Bertrand Russell (बर्ट्रेंड रसेल) — The Maestro of Human Emotion
Bertrand Russell was an illustrious figure in Philosopher, Mathematician & Nobel Laureate (1872–1970), renowned for A History of Western Philosophy, The Conquest of Happiness.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Bertrand Russell pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1872–1970, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Bertrand Russell captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Bertrand Russell's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Bertrand Russell effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Bertrand Russell?
Bertrand Russell was a renowned Philosopher, Mathematician & Nobel Laureate (1872–1970) from Ravenscroft, Trellech, Monmouthshire, UK, widely celebrated for CO-AUTHOR OF PRINCIPIA MATHEMATICA, NOBEL LAUREATE IN LITERATURE (1950), PIONEER OF ANALYTIC PHILOSOPHY & PACIFISM.
What is the central philosophy and message of Bertrand Russell?
The central philosophy of Bertrand Russell centers around Rigorous logical analysis, human happiness through constructive outward interest, anti-war pacifism, questioning dogma, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Bertrand Russell's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Bertrand Russell?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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