जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Balkrishna Sharma 'Naveen' (बालकृष्ण शर्मा 'नवीन')
Balkrishna Sharma 'Naveen' was an illustrious figure in Fiery Poet of National Awakening & MP (1897–1960), renowned for Kumkum, Rashmirekha.

जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
— BALKRISHNA SHARMA 'NAVEEN' • 1897–1960

जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
— BALKRISHNA SHARMA 'NAVEEN' • 1897–1960
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‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— Balkrishna Sharma 'Naveen'
Sher #1 • Classic Couplet
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।’— Balkrishna Sharma 'Naveen'
Sher #2 • Passionate Verse
मन के निर्मल दर्पण में जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Balkrishna Sharma 'Naveen'
Sher #3 • Soulful Couplet
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,

‘नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— Balkrishna Sharma 'Naveen'
Sher #4 • Philosophical Verse
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,
Immortal Couplets & Ghazals
मन के निर्मल दर्पण में जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

तेरी आँखों की झील में जो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Priyatam ki chaahat mein jisane aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मोह-निशा से जो जन जागा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,नेकी की राह पे जो जन वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Jisane prem ka marm samajh use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हृदय में जिसके दया बसी है अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
अहंकार की दीवारें जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

नैन मिले जब नैनन से तब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Nain mile jab nainan se tab ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ki paavan jyoti jagaaee man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

आँखों में जो नमी है वो सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Aankhon mein jo namee hai wo sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Dard ki is ekaant gufaa mein dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
अहंकार की दीवारें जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
अहंकार की दीवारें जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

दर्द की रात में जब कोई कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Dard ki raat mein jab koee koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Dil ke phapholon ko dekhakar tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
मन के निर्मल दर्पण में जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

आँखों के आँसू जब सूखे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए दिल का दर्द सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Aankhon ke aansoo jab sookhe lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Toote hue dil ka dard saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,नेकी की राह पे जो जन मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

कर्म की पावन वेदी पर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मेहनत और लगन से जिसने बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Karm ki paavan vedee par jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Mehanat aur lagan se jisane bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
वाणी में जो अमृत घोले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

गिरने में कोई हार नहीं हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जो अपने वचन का पक्का है मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Girane mein koee haar nahi hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jo apane vachan ka pakkaa hai manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

समय का पहिया चलता जाए कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,मेहनत और लगन से जिसने मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Mehanat aur lagan se jisane manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

अहंकार की दीवारें जब अंतर ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,अंतःकरण जब दर्पण की तरह वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Ahankaar ki deevaaren jab antar jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Antahkaran jab darpan ki tarah woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Mrityu koee ant nahi bas ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के रंग में रंग कर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरी आँखों की झील में जो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

मन की चंचलता को जिसने जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Man ki chanchalataa ko jisane jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

मन के निर्मल दर्पण में जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Man ke nirmal darpan mein jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Hriday mein jisake dayaa basee hai rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरे रूप की पावन झांकी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

मन मंदिर में जो दीप जले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Man mandir mein jo deep jale antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Satkarmon ki amit kamaaee hi woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के चरणों में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अमर प्रेम की अमर कहानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,नेकी की राह पे जो जन मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Nekee ki raah pe jo jan maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,मन मंदिर की पावन आरती संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Ahankaar ki deevaaren jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के चरणों में जिसने कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Priyatam ke rang mein rang kar liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
फासले मिट गए जब दिल से तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Roma-rom mein ram gaya preetam dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Prem nagar ka vaasee banakar jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैन मिले जब नैनन से तब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जब से नैना रूप में उलझे प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem binaa sab soonaa jag mein raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Prem ki paavan jyoti jagaaee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जब से नैना रूप में उलझे जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Toote dil ki khaamoshi mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Waqt ke is kroor prahaar ne keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
अकेलेपन की धूप जब साए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए सपनों की किरचें सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दिल का आईना जब टूटा अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस गहरी रात में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

आँखों के आँसू जब सूखे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Aankhon ke aansoo jab sookhe lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Jab koee chaaraasaaz na mila pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
भीतर-भीतर घुटता जाए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
तन्हाई के अँधियारे में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
आँखों में जो नमी है वो सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
नैनों से जो नीर बहे कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

ग़म की तपती दुपहरी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Gham ki tapatee dupaharee mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Jab dhairy ki seemaa toot gayi arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
ग़म की तपती दुपहरी में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
छाले पड़े हैं पाँवों में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की भट्टी में तपकर ही तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
आशा का दीप जब बुझने भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,कर्म की खेती में जो पसीना है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Karm ki khetee mein jo paseenaa hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
उम्र भर का सफ़र और पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
जिसके दिल पर बीत रही हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब सबने मुँह फेर लिया अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
आँखों में जो नमी है वो हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

माटी का यह चोला पाकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सच्चे मित्र की पहचान यही जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Maatee ka yeh cholaa paakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Sachche mitr ki pahachaan yahee jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
सांस-सांस में याद तुम्हारी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ग़म की तपती दुपहरी में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,टूटे हुए दिल का दर्द कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस गहरी रात में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दर्द की रात में जब कोई कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

चंद साँसों की मोहलत में अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Chand saanson ki mohalat mein antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Karmanyataa ka paavan vrat lekar woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
About Balkrishna Sharma 'Naveen' (बालकृष्ण शर्मा 'नवीन') — The Maestro of Human Emotion
Balkrishna Sharma 'Naveen' was an illustrious figure in Fiery Poet of National Awakening & MP (1897–1960), renowned for Kumkum, Rashmirekha.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Balkrishna Sharma 'Naveen' pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1897–1960, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Balkrishna Sharma 'Naveen' captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Balkrishna Sharma 'Naveen''s Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Balkrishna Sharma 'Naveen' effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Balkrishna Sharma 'Naveen'
Authentic answers about Balkrishna Sharma 'Naveen''s life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Balkrishna Sharma 'Naveen'?
Balkrishna Sharma 'Naveen' was a renowned Fiery Poet of National Awakening & MP (1897–1960) from Bhayana, Shajapur, Madhya Pradesh, India, widely celebrated for POET OF 'KAVI KUCH AISI TAAN SUNAO', CONSTITUENT ASSEMBLY MEMBER, PADMA BHUSHAN LAUREATE.
What is the central philosophy and message of Balkrishna Sharma 'Naveen'?
The central philosophy of Balkrishna Sharma 'Naveen' centers around Call for cataclysmic social revolution, poetic rebellion against stasis and inertia, intense devotion to the motherland, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Balkrishna Sharma 'Naveen''s literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Balkrishna Sharma 'Naveen'?
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