सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Avvaiyar (अव्वैयार)
Avvaiyar was the venerated Tamil saintess and poet whose timeless aphorisms in Aathichoodi and Konraiventhan guide ethical life and wisdom in Tamil culture.

सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
— AVVAIYAR • ANCIENT TAMIL SANGAM & CHOLA GOLDEN AGE

सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
— AVVAIYAR • ANCIENT TAMIL SANGAM & CHOLA GOLDEN AGE
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‘सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— Avvaiyar
Sher #1 • Classic Couplet
सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Avvaiyar
Sher #2 • Passionate Verse
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,शांति और संतोष का धन जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Avvaiyar
Sher #3 • Soulful Couplet
नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,
Immortal Couplets & Ghazals
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,शांति और संतोष का धन जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
वाणी में जो अमृत घोले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Man mandir mein basaa jo moorati to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Virah ki raat jab dhalane lagee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
मन मंदिर में जो दीप जले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Roma-rom mein ram gaya preetam haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem ki is paavan ghaatee mein aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
धरती की छाती पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,वाणी में जिसके मिठास घुली जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मोह-निशा से जो जन जागा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Roma-rom mein ram gaya preetam priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Virah ka har ik aansoo banakar jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
वाणी में जो अमृत घोले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

सपनों के महल जब टूटे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Sapanon ke mahal jab toote sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Jab koee sahaaraa na bachaa tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

छाले पड़े हैं पाँवों में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Chhaale pare hain paanvon mein aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Dard ki is ekaant gufaa mein manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,वाणी में जिसके मिठास घुली रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य-अहिंसा की राहों पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

नैनों से जो नीर बहे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई सहारा न बचा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Nainon se jo neer bahe ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Jab koee sahaaraa na bachaa to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
मन के निर्मल दर्पण में जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,जीवन का यह पावन सूत्र जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
अहंकार की दीवारें जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,विपदाओं से जो कभी न डरा वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Duhkh mein sumiran sab koee hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Vipadaaon se jo kabhee na daraa woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,नेकी की राह पे जो जन अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,भवसागर की लहरों से जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
संतन की संगति में आकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Duhkh mein sumiran sab koee binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jo doosaron ke sukh ki khaatir use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

ठोकर खाकर जो संभलता जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हृदय में जिसके दया और करुणा जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Thokar khaakar jo sanbhalataa jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य वचन जो मुख से बोले उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
मन मंदिर में जो दीप जले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,माटी का चोला पाकर जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

भवसागर की लहरों से जो मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Bhavasaagar ki laharon se jo man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन घाटी में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

भवसागर की लहरों से जो से निर्मल हो बाहर के पाखंड से मुक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन रहे,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Bhavasaagar ki laharon se jo se nirmal ho baahar ke paakhand se mukt hokar prabhu bhakti mein leen rahe,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

घट-घट में वह एक अनंता इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरे रूप की पावन झांकी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के रंग में रंग कर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम की चाहत में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Parahit mein jisane jeevan saunpaa jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम सुधा का रस जो चखा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी आँखों की झील में जो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अंतर में जब प्रेम समाया सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Karm ki khetee jo jan bove saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Bhavasaagar ki laharon se jo jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,विरह का हर इक आँसू बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Jo toofaanon mein apanee naav saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Prem ki dor mein bandh gaya jo lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरी याद का पावन साया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के चरणों में जिसने युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
बिरहा की आग में तप के कुंदन रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जब से नैना रूप में उलझे लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Saty ka deep jab jalataa hai nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Satsang ki nirmal gangaa mein apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
अंतर घट में जब ज्योति जगी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,मन मंदिर की पावन आरती और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,मन मंदिर की पावन आरती संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Tere roop ki paavan jhaankee priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Antar mein jab prem samaayaa jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
तेरे मिलन की आस में बीते अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,मन मंदिर की पावन आरती जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे दीदार की एक झलक ने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम गली अति साँकरी जामें से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

नैनन आगे तू ही तू नाचे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Nainan aage too hi too naache amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Priyatam ka anuraag hi jisakaa motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
मन मंदिर में बसा जो मूरति संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अमर प्रेम की अमर कहानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Roma-rom mein ram gaya preetam jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Virah ki raat jab dhalane lagee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरी याद का पावन साया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अंतर में जब प्रेम समाया एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,विरह का हर इक आँसू बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

ग़म का मारा पंछी जैसे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अंधेरी रात के सन्नाटे में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Gham ka maaraa panchhee jaise jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Andheree raat ke sannaate mein koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरी आँखों की झील में जो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब आशा की हर किरण बुझी तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
दर्द की रात में जब कोई हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,आँसुओं की इस भाषा को अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

दिल का आईना जब टूटा जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Dil ka aaina jab tootaa jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Jab apanon ne hi diye zakhm keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
छाले पड़े हैं पाँवों में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस आँधी ने जब तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
विरह की अगन में जलता मन जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
सपनों के महल जब टूटे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
मन के कोने में सिमटी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दिल के फफोलों को देखकर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

नैनों से जो नीर बहे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Nainon se jo neer bahe lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Waqt ke is kroor prahaar ne tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
उम्र भर का सफ़र और बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे दिल की इस वीणा से केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,अंधेरी रात के सन्नाटे में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,आँसुओं की इस भाषा को तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
दर्द की रात में जब कोई सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

धैर्य और संतोष का धन जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जो गिरतों को उठाना जानता है उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Dhairy aur santosh ka dhan jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
ग़म का मारा पंछी जैसे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अंधेरी रात के सन्नाटे में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
दर्द की रात में जब कोई पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब नयनों के सब आँसू सूखे तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
उम्र भर का सफ़र और सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब कोई चारासाज़ न मिला तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
विरह की अगन में जलता मन को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

वाणी में जो अमृत घोले हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जिसने अहंकार को त्याग दिया अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Vaanee mein jo amrit ghole hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
मन के कोने में सिमटी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस गहरी रात में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
आँखों में जो नमी है वो हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,टूटे हुए सपनों की किरचें तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब कोई चारासाज़ न मिला कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
छाले पड़े हैं पाँवों में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

हौसलों के तरकश में जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मेहनत और लगन से जिसने तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Hausalon ke tarakash mein jab saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Mehanat aur lagan se jisane tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
आँखों में जो नमी है वो किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द की भट्टी में तपकर ही ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
About Avvaiyar (अव्वैयार) — The Maestro of Human Emotion
Avvaiyar was the venerated Tamil saintess and poet whose timeless aphorisms in Aathichoodi and Konraiventhan guide ethical life and wisdom in Tamil culture.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Avvaiyar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Ancient Tamil Sangam & Chola Golden Age, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Avvaiyar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Avvaiyar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Avvaiyar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Avvaiyar
Authentic answers about Avvaiyar's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Avvaiyar and what was their literary significance?
Avvaiyar (Sangam & Medieval Era–Classical Era) was a monumental figure in Tamil/Classical literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Avvaiyar's poetry?
The core themes across Avvaiyar's oeuvre encompass सदाचार, विद्या और विनम्रता, ज्ञान की असीमता व अहंकार-मुक्ति, दीन-दुखियों की सेवा, मातृभूमि व भाषा से प्रेम, शाश्वत जीवन-दर्शन, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
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Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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