धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
Atulprasad Sen (अतुलप्रसाद सेन)
Atulprasad Sen was a distinguished Composer of Mora Ekoi Brinte representing the Bengali/Lyric tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
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‘धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।’— Atulprasad Sen
Sher #1 • Classic Couplet
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।’— Atulprasad Sen
Sher #2 • Passionate Verse
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।’— Atulprasad Sen
Sher #3 • Soulful Couplet
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,
Immortal Couplets & Ghazals
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
अतुलप्रसाद सेन कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
About Atulprasad Sen (अतुलप्रसाद सेन) — The Maestro of Human Emotion
Atulprasad Sen was a distinguished Composer of Mora Ekoi Brinte representing the Bengali/Lyric tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Atulprasad Sen pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Bengali/Lyric (1871–1934), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Atulprasad Sen captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Atulprasad Sen's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Atulprasad Sen effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Atulprasad Sen
Authentic answers about Atulprasad Sen's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Atulprasad Sen and what was their literary significance?
Atulprasad Sen (1871–1934) was a monumental figure in Bengali/Lyric literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Atulprasad Sen's poetry?
The core themes across Atulprasad Sen's oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Atulprasad Sen's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Atulprasad Sen?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Atulprasad Sen's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Atulprasad Sen?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Atulprasad Sen's poetry?
Yes! You can download high-resolution 300 DPI cards with full typography, or customize them in our online studio.
Where is Atulprasad Sen's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Atulprasad Sen stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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