वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
Farid ud-Din Attar (फ़रीदुद्दीन अत्तार)
فرید الدین عطار
Farid ud-Din Attar was the profound Persian Sufi poet whose allegory 'The Conference of the Birds' maps the perilous Seven Valleys of the soul's journey toward God.
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‘वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।’— Farid ud-Din Attar
Sher #1 • Classic Couplet
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,

‘तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।’— Farid ud-Din Attar
Sher #2 • Passionate Verse
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,

‘शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।’— Farid ud-Din Attar
Sher #3 • Soulful Couplet
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,
Immortal Couplets & Ghazals
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
About Farid ud-Din Attar (फ़रीदुद्दीन अत्तार) — The Maestro of Human Emotion
Farid ud-Din Attar was the profound Persian Sufi poet whose allegory 'The Conference of the Birds' maps the perilous Seven Valleys of the soul's journey toward God.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Farid ud-Din Attar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Persian Mystical Golden Age, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Farid ud-Din Attar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Farid ud-Din Attar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Farid ud-Din Attar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Farid ud-Din Attar
Authentic answers about Farid ud-Din Attar's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Farid ud-Din Attar and what was their literary significance?
Farid ud-Din Attar (1145–1221) was a monumental figure in Persian/Sufi literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Farid ud-Din Attar's poetry?
The core themes across Farid ud-Din Attar's oeuvre encompass सिमुर्ग़ की तलाश और आत्म-साक्षात्कार, इश्क़ की सात घाटियों का कठिन सफ़र, अहंकार और वासनाओं का मुकम्मल फ़ना, परमात्मा का हर ज़र्रे में नूर, सूफ़ी संतों की रूहानी हिकायतें, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Farid ud-Din Attar's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Farid ud-Din Attar?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Farid ud-Din Attar's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Farid ud-Din Attar?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Farid ud-Din Attar's poetry?
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Where is Farid ud-Din Attar's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Farid ud-Din Attar stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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