नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Atal Bihari Vajpayee (अटल बिहारी वाजपेयी)
Atal Bihari Vajpayee was an illustrious figure in Poet-Statesman & Prime Minister (1924–2018), renowned for Meri Ekyavan Kavitayen, Amar Balidan.

नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
— ATAL BIHARI VAJPAYEE • 1924–2018

नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
— ATAL BIHARI VAJPAYEE • 1924–2018
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‘नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।’— Atal Bihari Vajpayee
Sher #1 • Classic Couplet
नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— Atal Bihari Vajpayee
Sher #2 • Passionate Verse
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,

‘सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— Atal Bihari Vajpayee
Sher #3 • Soulful Couplet
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,
Immortal Couplets & Ghazals
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem ki doree baandh laee jab to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Sachche aashiq ki pahachaan yahee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अमर नाम जग में उसी का उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हरि की कृपा का पावन साया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ki paavan jyoti jagaaee jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,नेकी की राह पे जो जन उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,नेकी की राह पे जो जन अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Roma-rom mein ram gaya preetam jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Virah ki raat jab dhalane lagee use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
मन के निर्मल दर्पण में जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

टूटी नाव भँवर में फँसी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म के मारों की बस्ती में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Tootee naav bhanvar mein phansee jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Gham ke maaron ki bastee mein tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,जीवन का यह पावन सूत्र जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नदिया की धारा बहती जावे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

आँखों में जो नमी है वो दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब आशा की हर किरण बुझी जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Aankhon mein jo namee hai wo doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Jab aashaa ki har kiran bujhee jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

उम्र भर का सफ़र और दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Umr bhar ka safar aur dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jab apanon ne hi diye zakhm saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
नदिया की धारा बहती जावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
साधु-संगत की छाया में जो अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन के इस महासमर में जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jeevan ke is mahaasamar mein jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
वाणी में जो अमृत घोले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
अहंकार की दीवारें जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

चंद साँसों की मोहलत में जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,मेहनत और लगन से जिसने मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Chand saanson ki mohalat mein jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Mehanat aur lagan se jisane manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
साधु-संगत की छाया में जो सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,शांति और संतोष का धन जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

समय का पहिया चलता जाए तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,विपदाओं से जो कभी न डरा वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Vipadaaon se jo kabhee na daraa vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,मोह-निशा से जो जन जागा वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,शांति और संतोष का धन जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्संग की निर्मल गंगा में जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

मोह-निशा जब ढलती है व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,परम शांति का यह पावन धाम उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Moha-nishaa jab dhalatee hai vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Param shaanti ka yeh paavan dhaam usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,नेकी की राह पे जो जन उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम बिना सब सूना जग में अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

सत्य-अहिंसा की राहों पर है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Satya-ahinsaa ki raahon par hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा हुआ उसे तीनों लोकों का कोई भी प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता।
Antarman ke sannaate mein jab vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa hua use teenon lokon ka koee bhi pralobhan apanee or aakarshit nahi kar sakataa.
तेरे दीदार की एक झलक ने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम का अनुराग ही जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरी याद का पावन साया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम बिना सब सूना जग में तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

मन के निर्मल दर्पण में जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Man ke nirmal darpan mein jab ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Sadaachaar ki paavan vedee par jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अंतर में जब प्रेम समाया उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

साधु-संगत की छाया में जो अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
अंतर घट में जब ज्योति जगी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम नगर का वासी बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम रंग में जो रंग गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,नेकी की राह पे जो जन उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Nekee ki raah pe jo jan use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम की चाहत में जिसने नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

प्रियतम की याद में जो नैना बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Hriday ke paavan sinhaasan par ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
तेरे रूप की पावन झांकी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के चरणों में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे प्रेम की यही निशानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरी याद का पावन साया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने अपना सब कुछ सौंपा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Roma-rom mein ram gaya preetam doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Prem ki paavan jyoti jagaaee apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम की चाहत में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Priyatam ke charanon mein jisane apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन धारा में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम का दीपक अंतर में जो एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

मन के कोने में सिमटी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Man ke kone mein simatee ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Andheree raat ke sannaate mein akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम की चाहत में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
आँखों के आँसू जब सूखे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द की भट्टी में तपकर ही धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
नैनों से जो नीर बहे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

टूटी नाव भँवर में फँसी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Tootee naav bhanvar mein phansee so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jeevan ke is kathin mod par tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
अकेलेपन की धूप जब साए दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
छाले पड़े हैं पाँवों में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब कोई सहारा न बचा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
टूटी नाव भँवर में फँसी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म के मारों की बस्ती में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
दर्द की रात में जब कोई को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब नयनों के सब आँसू सूखे सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

जिसके दिल पर बीत रही सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब आशा की हर किरण बुझी पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Jisake dil par beet rahi so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jab aashaa ki har kiran bujhee pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
तन्हाई के अँधियारे में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
दिल का आईना जब टूटा और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब आशा की हर किरण बुझी पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
मन के कोने में सिमटी और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
दिल का आईना जब टूटा किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

नदी की तरह बहते रहना जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,मेहनत और लगन से जिसने जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Nadee ki tarah bahate rahanaa jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Mehanat aur lagan se jisane jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
मन के कोने में सिमटी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म की इस लंबी यात्रा में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म के मारों की बस्ती में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,आँसुओं की इस भाषा को पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य और धर्म की राहों पर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Ahankaar ki deevaaren jab antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Saty aur dharm ki raahon par jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
भीतर-भीतर घुटता जाए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,अकेलेपन की इस राह पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
अकेलेपन की धूप जब साए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की भट्टी में तपकर ही सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
आँखों के आँसू जब सूखे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अकेलेपन की इस राह पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
आँखों में जो नमी है वो दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब आशा की हर किरण बुझी जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

नदी की तरह बहते रहना धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,सत्य और धर्म की राहों पर तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Nadee ki tarah bahate rahanaa dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Saty aur dharm ki raahon par tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब नयनों के सब आँसू सूखे सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
About Atal Bihari Vajpayee (अटल बिहारी वाजपेयी) — The Maestro of Human Emotion
Atal Bihari Vajpayee was an illustrious figure in Poet-Statesman & Prime Minister (1924–2018), renowned for Meri Ekyavan Kavitayen, Amar Balidan.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Atal Bihari Vajpayee pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1924–2018, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Atal Bihari Vajpayee captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Atal Bihari Vajpayee's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Atal Bihari Vajpayee effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Atal Bihari Vajpayee
Authentic answers about Atal Bihari Vajpayee's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Atal Bihari Vajpayee?
Atal Bihari Vajpayee was a renowned Poet-Statesman & Prime Minister (1924–2018) from Gwalior, Madhya Pradesh, India, widely celebrated for POET-PRIME MINISTER OF INDIA, MASTER OF HINDI ORATORY, POKHRAN-II ARCHITECT, BHARAT RATNA.
What is the central philosophy and message of Atal Bihari Vajpayee?
The central philosophy of Atal Bihari Vajpayee centers around Patriotic resolve, parliamentary consensus, moral rectitude in victory, lyrical emotional depth, peace with strength, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Atal Bihari Vajpayee's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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