अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Dr. A. P. J. Abdul Kalam (डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम)
Dr. A. P. J. Abdul Kalam was an illustrious figure in Rashtranayak & Visionary Leader (1931–2015), renowned for Wings of Fire, Ignited Minds.

अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— DR. A. P. J. ABDUL KALAM • 1931–2015

अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— DR. A. P. J. ABDUL KALAM • 1931–2015
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‘अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— Dr. A. P. J. Abdul Kalam
Sher #1 • Classic Couplet
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— Dr. A. P. J. Abdul Kalam
Sher #2 • Passionate Verse
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,

‘वाणी वही जो घाव भरे और तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— Dr. A. P. J. Abdul Kalam
Sher #3 • Soulful Couplet
वाणी वही जो घाव भरे और तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,

‘नदिया की धारा बहती जावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,भवसागर की लहरों से जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— Dr. A. P. J. Abdul Kalam
Sher #4 • Philosophical Verse
नदिया की धारा बहती जावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,
Immortal Couplets & Ghazals
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी वही जो घाव भरे और तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
नदिया की धारा बहती जावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,भवसागर की लहरों से जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

तेरी आँखों की झील में जो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Jab se nainaa roop mein ulajhe to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
संतन की संगति में आकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Prem binaa sab soonaa jag mein sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ka deepak antar mein jo jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नाम और दौलत तो माटी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,नेकी की राह पे जो जन उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Prem ki mastee mein jo jhoomaa motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नाम और दौलत तो माटी प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

घायल की गति घायल जाने और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jeevan ke is kathin mod par paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,नेकी की राह पे जो जन उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,नेकी की राह पे जो जन अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

ग़म की तपती दुपहरी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Gham ki tapatee dupaharee mein antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Waqt ke is kroor prahaar ne keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,धैर्य का दामन जिसने थामे जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

दिल का आईना जब टूटा और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,अंधेरी रात के सन्नाटे में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Dil ka aaina jab tootaa aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Andheree raat ke sannaate mein pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
नदिया की धारा बहती जावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
साधु-संगत की छाया में जो मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हरि की कृपा का पावन साया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन का यह पावन सूत्र जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

गिरने में कोई हार नहीं भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अंत समय जब निकट आएगा तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Girane mein koee haar nahi bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Ant samay jab nikat aaegaa tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,शांति और संतोष का धन जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

जीवन की इस रणभूमि में उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,जिसने अहंकार को त्याग दिया पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Jeevan ki is ranabhoomi mein usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,नेकी की राह पे जो जन जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
वाणी वही जो घाव भरे और तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,भवसागर की लहरों से जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,नेकी की राह पे जो जन रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

मन मंदिर में जो दीप बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जिसने अहंकार को त्याग दिया उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Man mandir mein jo deep binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हरि की कृपा का पावन साया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

पानी केरा बुदबुदा अस में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,परमानंद का यह अलौकिक रस उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Paani keraa budabudaa as mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Paramaanand ka yeh alaukik ras usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
वाणी में जो अमृत घोले सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

अमृत की बूँद अंतर में अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Amrit ki boond antar mein avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

पानी केरा बुदबुदा अस है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Paani keraa budabudaa as hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Amrit svaroop us paramaatmaa mein tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Satkarmon ki amit jyoti jab amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Sadaachaar ki paavan vedee par rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अंतर में जब प्रेम समाया प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Duhkh mein sumiran sab koee karai saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Man ke mail ko jisane dhoyaa apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
तेरी आँखों की झील में जो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम बिना सब सूना जग में जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन का यह पावन सूत्र जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Jeevan ka yeh paavan sootr jo nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के चरणों में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अंतर में जब प्रेम समाया उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

वाणी में जो अमृत घोले सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Vaanee mein jo amrit ghole soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Amar naam jag mein usee ka paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे मिलन की आस में बीते बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अमर प्रेम की अमर कहानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Tere roop ki paavan jhaankee amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Amar prem ki amar kahaanee jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
साँसों की सरगम में घुल गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम सुधा का रस जो चखा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Prem rang mein jo rang gaya haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Antar mein jab prem samaayaa apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
तेरे मिलन की आस में बीते संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रियतम की याद में जो नैना संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम के रंग में रंग कर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
मन की वीणा बज उठी जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Tere deedaar ki ek jhalak ne jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ke is paavan teerath mein sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
मन मंदिर में बसा जो मूरति तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,अंतर में जब प्रेम समाया जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम का दीपक अंतर में जो कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

वक़्त की आँधी ने तोड़े और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस गहरी रात में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Waqt ki aandhee ne tore aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Gham ki is gaharee raat mein tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
घायल की गति घायल जाने यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,टूटे हुए सपनों की किरचें तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

सांस-सांस में याद तुम्हारी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Dil ke phapholon ko dekhakar pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
सांस-सांस में याद तुम्हारी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द की भट्टी में तपकर ही जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
मन के कोने में सिमटी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,टूटे हुए सपनों की किरचें तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
घायल की गति घायल जाने और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
ग़म का मारा पंछी जैसे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

आँखों के आँसू जब सूखे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Aankhon ke aansoo jab sookhe jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Jab apanon ne hi diye zakhm akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
कोई न अपना इस जग में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस गहरी रात में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
घायल की गति घायल जाने भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
आँखों के आँसू जब सूखे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
दिल का आईना जब टूटा सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

अहंकार की दीवारें जब तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,मेहनत और लगन से जिसने अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Ahankaar ki deevaaren jab tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Mehanat aur lagan se jisane apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस गहरी रात में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
छाले पड़े हैं पाँवों में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे हुए दिल का दर्द सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
आँखों के आँसू जब सूखे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
सपनों के महल जब टूटे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,समय की अमूल्य बूँदों को तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Samay ki amooly boondon ko tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दिल के फफोलों को देखकर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
अकेलेपन की धूप जब साए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
ग़म की तपती दुपहरी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

वाणी में जो अमृत घोले जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,सत्संगति का पावन प्रभाव उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Vaanee mein jo amrit ghole jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Satsangati ka paavan prabhaav usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस आँधी ने जब अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
About Dr. A. P. J. Abdul Kalam (डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम) — The Maestro of Human Emotion
Dr. A. P. J. Abdul Kalam was an illustrious figure in Rashtranayak & Visionary Leader (1931–2015), renowned for Wings of Fire, Ignited Minds.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Dr. A. P. J. Abdul Kalam pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1931–2015, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
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Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Dr. A. P. J. Abdul Kalam captured the bittersweet beauty of human existence.
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Dr. A. P. J. Abdul Kalam was a renowned Rashtranayak & Visionary Leader (1931–2015) from Rameswaram, Tamil Nadu, India, widely celebrated for MISSILE MAN OF INDIA, PEOPLE'S PRESIDENT, BHARAT RATNA.
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The central philosophy of Dr. A. P. J. Abdul Kalam centers around Youth empowerment, scientific temper, unyielding perseverance, humility, national self-reliance, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Dr. A. P. J. Abdul Kalam's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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