आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Akho (अखो)
Akho was an uncompromising 17th-century Gujarati Vedantic poet-philosopher famous for his Chhappa verses satirizing hypocrisy, blind dogma, and social superstition.

आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
— AKHO • GUJARATI VEDANTIC ERA (1591–1659)

आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
— AKHO • GUJARATI VEDANTIC ERA (1591–1659)
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Akho
Sher #1 • Classic Couplet
आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,

‘अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— Akho
Sher #2 • Passionate Verse
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,भवसागर की लहरों से जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— Akho
Sher #3 • Soulful Couplet
कर्म की खेती जो जन बोवे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,
Immortal Couplets & Ghazals
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,भवसागर की लहरों से जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हरि की कृपा का पावन साया वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Ishq jab rooh mein utarataa hai us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
वाणी में जो अमृत घोले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मन के मैल को जिसने धोया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
कर्म की खेती जो जन बोवे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

साँसों की सरगम में घुल गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Saanson ki saragam mein ghul gaya tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Amar prem ki amar kahaanee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,शांति और संतोष का धन जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

मन की वीणा बज उठी जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Man ki veenaa baj uthee jab jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Prem ki paavan jyoti jagaaee ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
माटी का यह देह बना है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,अहंकार का त्याग किया जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

उम्र भर का सफ़र और दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब कोई सहारा न बचा केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Umr bhar ka safar aur dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jab koee sahaaraa na bachaa keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
माटी का यह देह बना है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
माटी का यह देह बना है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
अहंकार की दीवारें जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Waqt ke thaperon ne hamen so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jab apanon ne hi diye zakhm chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
वाणी में जो अमृत घोले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,शांति और संतोष का धन जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
नदिया की धारा बहती जावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,माटी का चोला पाकर जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

जिसके दिल पर बीत रही रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Jisake dil par beet rahi ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Dard ki is ekaant gufaa mein tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
अहंकार की दीवारें जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,नेकी की राह पे जो जन जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

समय का पहिया चलता जाए जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जिसने समय की चाल पहचानी उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jisane samay ki chaal pahachaanee usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
साधु-संगत की छाया में जो का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मोह-निशा से जो जन जागा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्य के पावन पथ पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Satkarmon ki amit poonjee binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Karmanyataa ka paavan vrat lekar aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य-अहिंसा की राहों पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
धरती की छाती पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
धरती की छाती पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मन के मैल को जिसने धोया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

हौसलों के तरकश में जब जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जिसने समय की चाल पहचानी वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Hausalon ke tarakash mein jab jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jisane samay ki chaal pahachaanee woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
अहंकार की दीवारें जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
साधु-संगत की छाया में जो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

साधु वो ही जो अंतर है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Saadhu wo hi jo antar hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रेम गली अति साँकरी जामें से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने प्रेम का मर्म समझ मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

भवसागर की लहरों से जो व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब तब आत्मा अनादि और अनंत काल के पार शाश्वत धाम में पहुँच गई।
Bhavasaagar ki laharon se jo vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab tab aatmaa anaadi aur anant kaal ke paar shaashvat dhaam mein pahunch gayi.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के चरणों में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

भवसागर की लहरों से जो मानुष की जात देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Bhavasaagar ki laharon se jo maanush ki jaat dekhat hi chhip jaaegaa jyon taaraa parabhaat,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
तेरी आँखों की झील में जो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे रूप की पावन झांकी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Ahankaar ki deevaaren jab saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Dhairy ka daaman jisane thaame use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम की चाहत में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Prem ki dor mein bandh gaya jo ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन घाटी में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
साँसों की सरगम में घुल गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Jo toofaanon mein apanee naav saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Man ke mail ko jisane dhoyaa usane paramaanand paayaa ahankaar mitate hi antar ka sachchaa sukh milataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन धारा में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Bhavasaagar ki laharon se jo ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैन मिले जब नैनन से तब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अमर प्रेम की अमर कहानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Prem ki paavan vedee par jisane jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ki mastee mein jo jhoomaa ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,साँसों के हर तार पे जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम के चरणों में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह का हर इक आँसू बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Man mandir mein basaa jo moorati dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Saanson ke har taar pe jisakaa jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
तेरे मिलन की आस में बीते रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
मन की वीणा बज उठी जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम का दीपक अंतर में जो युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
साँसों की सरगम में घुल गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Phaasale mit gaye jab dil se priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Priyatam ka anuraag hi jisakaa ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,मन मंदिर की पावन आरती अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैनों के दर्पण में बसा जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

मन के कोने में सिमटी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Man ke kone mein simatee ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Gham ki is gaharee raat mein tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जब से नैना रूप में उलझे सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस गहरी रात में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
दिल का आईना जब टूटा पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस गहरी रात में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

मन के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Man ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Zindagi ki is soonee dagar par keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
जिसके दिल पर बीत रही भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
अकेलेपन की धूप जब साए दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,टूटे हुए सपनों की किरचें तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
उम्र भर का सफ़र और दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब कोई सहारा न बचा केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
अकेलेपन की धूप जब साए अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,अंधेरी रात के सन्नाटे में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

टूटे दिल की ख़ामोशी में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Toote dil ki khaamoshi mein patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Jeevan ke is kathin mod par tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
उम्र भर का सफ़र और सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब धैर्य की सीमा टूट गई ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
तन्हाई के अँधियारे में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
वक़्त की आँधी ने तोड़े यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दिल के फफोलों को देखकर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

नेकी की राह पे जो जन धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Nekee ki raah pe jo jan dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
मन के कोने में सिमटी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द की भट्टी में तपकर ही अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दर्द की रात में जब कोई किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
सपनों के महल जब टूटे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

संतन की संगति में आकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी के इस पुतले में जब सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Santan ki sangati mein aakar jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Maatee ke is putale mein jab saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,टूटे दिल की इस वीणा से सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
ग़म का मारा पंछी जैसे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस गहरी रात में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
दिल का आईना जब टूटा भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब धैर्य की सीमा टूट गई मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

हौसलों के तरकश में जब जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,संतोषी सदा सुखी रहता है मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Hausalon ke tarakash mein jab jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
सांस-सांस में याद तुम्हारी हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,आँसुओं की इस भाषा को चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
About Akho (अखो) — The Maestro of Human Emotion
Akho was an uncompromising 17th-century Gujarati Vedantic poet-philosopher famous for his Chhappa verses satirizing hypocrisy, blind dogma, and social superstition.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Akho pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Gujarati Vedantic Era (1591–1659), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Akho captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Akho's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Akho effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Akho
Authentic answers about Akho's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Akho and what was their literary significance?
Akho (1591–1659) was a monumental figure in Gujarati/Philosophical literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Akho's poetry?
The core themes across Akho's oeuvre encompass अद्वैत वेदांत व आत्म-ज्ञान, धार्मिक पाखंड व आडंबर पर चोट, सत्य, विवेक और अंतर्दृष्टि, माया और सांसारिक भ्रम का अंत, सहज जीवन और निर्भयता, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Akho's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Akho?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Akho's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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