हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
Akbar Allahabadi (अकबर इलाहाबादी)
اکبر الہ آبادی
Akbar Allahabadi was a legendary Urdu satirist whose humorous, biting verses critiqued blind Western imitation while defending cultural roots with brilliant wit.
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‘हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।’— Akbar Allahabadi
Sher #1 • Classic Couplet
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,

‘तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।’— Akbar Allahabadi
Sher #2 • Passionate Verse
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,

‘शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।’— Akbar Allahabadi
Sher #3 • Soulful Couplet
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,
Immortal Couplets & Ghazals
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
About Akbar Allahabadi (अकबर इलाहाबादी) — The Maestro of Human Emotion
Akbar Allahabadi was a legendary Urdu satirist whose humorous, biting verses critiqued blind Western imitation while defending cultural roots with brilliant wit.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Akbar Allahabadi pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Colonial Era Satire & Reform, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Akbar Allahabadi captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Akbar Allahabadi's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Akbar Allahabadi effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Akbar Allahabadi
Authentic answers about Akbar Allahabadi's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Akbar Allahabadi and what was their literary significance?
Akbar Allahabadi (1846–1921) was a monumental figure in Urdu/Satirical literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Akbar Allahabadi's poetry?
The core themes across Akbar Allahabadi's oeuvre encompass अंग्रेज़ी तहज़ीब की अंधी नक़ल पर तंज़, दकियानूसी रस्मों और मुल्लाओं पर कटाक्ष, इश्क़ और रिंदी का मस्त अंदाज़, सांस्कृतिक जड़ों और तहज़ीब की हिफ़ाज़त, हँसी-हँसी में गहरे सच का इज़हार, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Akbar Allahabadi's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Akbar Allahabadi?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Akbar Allahabadi's impact on literary culture?
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