सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।
Ahmad Faraz (अहमद फ़राज़)
احمد فراز
Syed Ahmad Shah, globally celebrated as Ahmad Faraz, was one of the greatest modern Urdu poets, compared directly with Faiz Ahmed Faiz. His passionate romantic ghazals and fiery poems against military dictatorship established him as a legendary voice across the Urdu-speaking world.
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‘सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।’— Ahmad Faraz
Sher #1 • Classic Couplet
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,

‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।’— Ahmad Faraz
Sher #2 • Passionate Verse
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,

‘सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते,वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते।’— Ahmad Faraz
Sher #3 • Soulful Couplet
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते,
Immortal Couplets & Ghazals
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते,वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते।
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा,वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा।
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल,हार जाने का हौसला है मुझे।
ज़िंदगी से यही गिला है मुझे,तू बहुत देर से मिला है मुझे।
हम अपनी शाम को जब नज़्र-ए-जाम करते हैं,अदब से हम को सितारे सलाम करते हैं।

उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया,मुद्दतों बाद मिरी आँखों में अश्क आए।
कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला,हम डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला।
क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने आए,दिल मिले जब भी तो मिलने के बहाने आए।
दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला,वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला।

किस से शिकवा करें किस को अपना कहें,जब ज़माने में अपना कोई न रहा।
मैं तो चुप था मगर उस ने भी सदा न दी,फासले बढ़ते गए दोनों के दरमियाँ।
हम तिरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरह,सिर्फ़ इक बार मुलाक़ात का मौक़ा दे दे।
ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया,जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।

उस के चेहरे की चमक के सामने कुछ भी न था,चाँद भी मांद था तारों का उजाला भी न था।
दिल का शीशा जो टूटा तो सदा तक न हुई,ज़ुल्म ऐसा था कि फ़रियाद भी हम कर न सके।
जाने किस मोड़ पे ले आई मोहब्बत हम को,ना ही जीने की तमन्ना ना ही मरने की दुआ।
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ,अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें।

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,हार जाने का हौसला है मुझे।
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा,उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया।
ज़िंदगी से यही गिला है मुझे,दिल मिले जब भी तो मिलने के बहाने आए।
अदब से हम को सितारे सलाम करते हैं,मैं तो चुप था मगर उस ने भी सदा न दी।

कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला,जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।
दिल मिले जब भी तो मिलने के बहाने आए,हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन।
किस से शिकवा करें किस को अपना कहें,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
फासले बढ़ते गए दोनों के दरमियाँ,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया,सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।
चाँद भी मांद था तारों का उजाला भी न था,अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें।
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन,हार जाने का हौसला है मुझे।
ना ही जीने की तमन्ना ना ही मरने की दुआ,उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया।

तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,दिल मिले जब भी तो मिलने के बहाने आए।
मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,मैं तो चुप था मगर उस ने भी सदा न दी।
जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है,जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं,हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन।

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल,सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।
तू बहुत देर से मिला है मुझे,अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें।

उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया,हार जाने का हौसला है मुझे।
हम डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला,उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया।
दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला,दिल मिले जब भी तो मिलने के बहाने आए।
जब ज़माने में अपना कोई न रहा,मैं तो चुप था मगर उस ने भी सदा न दी।

हम तिरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरह,जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया,हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन।
दिल का शीशा जो टूटा तो सदा तक न हुई,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।

सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है,सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।
तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,हार जाने का हौसला है मुझे।
बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया।

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,दिल मिले जब भी तो मिलने के बहाने आए।
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते,मैं तो चुप था मगर उस ने भी सदा न दी।
आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा,जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।
हार जाने का हौसला है मुझे,हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन।

हम अपनी शाम को जब नज़्र-ए-जाम करते हैं,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
मुद्दतों बाद मिरी आँखों में अश्क आए,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने आए,सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला,अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें।

मैं तो चुप था मगर उस ने भी सदा न दी,हार जाने का हौसला है मुझे।
सिर्फ़ इक बार मुलाक़ात का मौक़ा दे दे,उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया।
उस के चेहरे की चमक के सामने कुछ भी न था,दिल मिले जब भी तो मिलने के बहाने आए।
ज़ुल्म ऐसा था कि फ़रियाद भी हम कर न सके,मैं तो चुप था मगर उस ने भी सदा न दी।

जाने किस मोड़ पे ले आई मोहब्बत हम को,जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
About Ahmad Faraz (अहमद फ़राज़) — The Maestro of Human Emotion
Syed Ahmad Shah, globally celebrated as Ahmad Faraz, was one of the greatest modern Urdu poets, compared directly with Faiz Ahmed Faiz. His passionate romantic ghazals and fiery poems against military dictatorship established him as a legendary voice across the Urdu-speaking world.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Ahmad Faraz pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Modern Urdu Romanticism & Resistance Era, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Ahmad Faraz captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Ahmad Faraz's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Ahmad Faraz effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Ahmad Faraz
Authentic answers about Ahmad Faraz's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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What was Ahmad Faraz's original birth name?
He was born Syed Ahmad Shah in Kohat, North-West Frontier Province (now Khyber Pakhtunkhwa), taking the pen name Ahmad Faraz.
Who famously sang Ahmad Faraz's ghazal 'Ranjish Hi Sahi'?
Ustad Mehdi Hassan's iconic rendition of 'Ranjish Hi Sahi' turned it into an immortal classic across India, Pakistan, and the global diaspora.
Why went Ahmad Faraz into self-imposed exile?
During General Zia-ul-Haq's military rule, Faraz composed poems criticizing martial law, was arrested, and subsequently lived in exile in Britain and Canada for six years.
What are Ahmad Faraz's most celebrated books?
His iconic anthologies include 'Tanha Tanha', 'Dard-e-Aashob', 'Janana Janana', 'Shab-e-Khoon', 'Be-Awaz Galiyon Mein', and 'Mere Khwab Reza Reza'.
Did Ahmad Faraz return his civil awards?
Yes, in 2006, Faraz famously returned his Hilal-e-Imtiaz to protest against actions taken against the judiciary by the government of Pervez Musharraf.
Can I copy and share Ahmad Faraz's couplets on Emotion Hub?
Yes! All 202 verses are available with instant copy, WhatsApp sharing, and 300 DPI high-res card downloads.
When did Ahmad Faraz pass away?
He passed away on August 25, 2008, in Islamabad, mourned universally as the sultan of Urdu romanticism.
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