प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Adi Shankaracharya (आदि शंकराचार्य)
Adi Shankaracharya was an illustrious figure in Spiritual Master & Jagadguru (788–820 CE), renowned for Brahma Sutra Bhashya, Vivekachudamani.

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— ADI SHANKARACHARYA • 788–820 CE

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— ADI SHANKARACHARYA • 788–820 CE
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‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— Adi Shankaracharya
Sher #1 • Classic Couplet
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— Adi Shankaracharya
Sher #2 • Passionate Verse
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Adi Shankaracharya
Sher #3 • Soulful Couplet
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,
Immortal Couplets & Ghazals
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
आशा तृष्णा सब छूटी जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,धैर्य का दामन जिसने थामे लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम का अनुराग ही जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Priyatam ka anuraag hi jisakaa naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,मन के मैल को जिसने धोया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नदिया की धारा बहती जावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सदाचार की पावन वेदी पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Antar ghat mein jab jyoti jagee banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki paavan jyoti jagaaee motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,शांति और संतोष का धन जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Ishq ki raah anokhee bande palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Amar prem ki amar kahaanee jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
नदिया की धारा बहती जावे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,धैर्य का दामन जिसने थामे व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
नदिया की धारा बहती जावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

कोई न अपना इस जग में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Koee na apanaa is jag mein hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jeevan ke is kathin mod par pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हरि की कृपा का पावन साया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

दिल का आईना जब टूटा हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस गहरी रात में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Dil ka aaina jab tootaa hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Gham ki is gaharee raat mein tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
वाणी में जो अमृत घोले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हृदय में जिसके दया बसी है मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
संतन की संगति में आकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

ग़म का मारा पंछी जैसे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म के मारों की बस्ती में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Gham ke maaron ki bastee mein saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,नेकी की राह पे जो जन अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य का दीप जब जलता है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

नेकी की राह पे जो जन सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,विपदाओं से जो कभी न डरा मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Nekee ki raah pe jo jan saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Vipadaaon se jo kabhee na daraa manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
कर्म की खेती जो जन बोवे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नाम और दौलत तो माटी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
साधु-संगत की छाया में जो सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अमर नाम जग में उसी का के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

सच्ची लगन से जो जन जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,धैर्य की नौका पर सवार होकर तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Sachchee lagan se jo jan jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Dhairy ki naukaa par savaar hokar tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
मन के निर्मल दर्पण में जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,धैर्य का दामन जिसने थामे निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

चंद साँसों की मोहलत में ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,त्याग और सेवा की भावना से जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Chand saanson ki mohalat mein hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,भवसागर की लहरों से जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
साधु-संगत की छाया में जो मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

परमसत्य का पावन दर्शन है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Paramasaty ka paavan darshan hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जिसने प्रेम का मर्म समझ नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रियतम की याद में जो नैना से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Jisane is nashvar shareer ka moh to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
प्रेम रंग में जो रंग गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम का अनुराग ही जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

ज्ञान की पावन भोर भई उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Jisane is nashvar shareer ka moh to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
तेरे दीदार की एक झलक ने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम रंग में जो रंग गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के रंग में रंग कर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Hari sumiran mein jisakaa chitt to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Jeevan ka yeh paavan sootr jo maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरे मिलन की आस में बीते का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह की रात जब ढलने लगी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम रंग में जो रंग गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के चरणों में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,मन मंदिर की पावन आरती संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Saadhu purush ki vaanee kabhee usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम के इस पावन तीरथ में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के चरणों में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ जब रूह में उतरता है का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम की चाहत में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Satkarmon ki amit jyoti jab jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Satya-ahinsaa ki raahon par jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन धारा में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Prem ki gangaa antar mein bahe antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरी याद का पावन साया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,मन मंदिर की पावन आरती सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के चरणों में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम रंग में जो रंग गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

प्रेम रंग में जो रंग गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के चरणों में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Prem rang mein jo rang gaya doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Priyatam ke charanon mein jisane ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जब से नैना रूप में उलझे एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के चरणों में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Nainan aage too hi too naache to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Priyatam ke charanon mein jisane jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
नैन मिले जब नैनन से तब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अमर प्रेम की अमर कहानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Nainan aage too hi too naache dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Priyatam ki chaahat mein jisane apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अमर प्रेम की अमर कहानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

विरह की अगन में जलता मन और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Virah ki agan mein jalataa man aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jeevan ke is kathin mod par keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह की रात जब ढलने लगी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
सांस-सांस में याद तुम्हारी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस आँधी ने जब सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
दर्द की रात में जब कोई लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

आशा का दीप जब बुझने रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस आँधी ने जब जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Aashaa ka deep jab bujhane ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Gham ki is aandhee ne jab jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
टूटी नाव भँवर में फँसी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
दिल का आईना जब टूटा हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,आँसुओं की इस भाषा को केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
कोई न अपना इस जग में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आँखों में जो नमी है वो जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब नयनों के सब आँसू सूखे तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

मन के कोने में सिमटी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Man ke kone mein simatee ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Gham ki is lanbee yaatraa mein keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म के मारों की बस्ती में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब नयनों के सब आँसू सूखे सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
विरह की अगन में जलता मन को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

गिरने में कोई हार नहीं जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जो गिरतों को उठाना जानता है तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Girane mein koee haar nahi jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
विरह की अगन में जलता मन और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
कोई न अपना इस जग में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
छाले पड़े हैं पाँवों में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,टूटे दिल की इस वीणा से धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
उम्र भर का सफ़र और पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म के मारों की बस्ती में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

समय का पहिया चलता जाए अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन के इस महासमर में और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jeevan ke is mahaasamar mein aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
उम्र भर का सफ़र और को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
तन्हाई के अँधियारे में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
आँखों में जो नमी है वो यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब कोई चारासाज़ न मिला तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
दिल का आईना जब टूटा हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस गहरी रात में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

चंद साँसों की मोहलत में ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,हृदय में जिसके दया और करुणा वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Chand saanson ki mohalat mein hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
ग़म की तपती दुपहरी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द का यह गहरा सागर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
About Adi Shankaracharya (आदि शंकराचार्य) — The Maestro of Human Emotion
Adi Shankaracharya was an illustrious figure in Spiritual Master & Jagadguru (788–820 CE), renowned for Brahma Sutra Bhashya, Vivekachudamani.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Adi Shankaracharya pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 788–820 CE, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Adi Shankaracharya captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Adi Shankaracharya's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Adi Shankaracharya effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Adi Shankaracharya?
Adi Shankaracharya was a renowned Spiritual Master & Jagadguru (788–820 CE) from Kalady, Kerala, India, widely celebrated for JAGADGURU, MASTER OF ADVAITA VEDANTA, FOUNDER OF CHAR DHAM MATHAS.
What is the central philosophy and message of Adi Shankaracharya?
The central philosophy of Adi Shankaracharya centers around Advaita Vedanta (Non-dualism: Brahma Satyam Jagan Mithya), unity of Atman and Brahman, intellectual synthesis of Sanatan Dharma, leaving timeless guidance for humanity.
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Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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