तिरी तलाश में भटके तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,सहर की पहली किरन ने पयाम हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
Abbas Tabish (अब्बास ताबिश)
Abbas Tabish was an illustrious figure in Eminent Urdu Poet & Creator of Mother Couplet (Born 1961), renowned for Tamheed, Aasman.
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‘तिरी तलाश में भटके तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,सहर की पहली किरन ने पयाम हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।’— Abbas Tabish
Sher #1 • Classic Couplet
तिरी तलाश में भटके तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,

‘मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।’— Abbas Tabish
Sher #2 • Passionate Verse
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,

‘मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।’— Abbas Tabish
Sher #3 • Soulful Couplet
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,
Immortal Couplets & Ghazals
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
तिरे करम का सहारा जो मिल बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,हमारी आँख में जलते रहे कई में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,मोहब्बत के पावन सफ़र में बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
Nigaaha-e-shauq ne har manzar pahachaan bhi qadam rakhaa to har gham khaar banake bikhar gaya,Mohabbat ke paavan safar mein beete vahee hamaaree hayaat ka haasil bane.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
नज़र नज़र में समाई है जब गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,नज़र झुका के जो देखा तो दिल भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
तिरी तलाश में भटके तो ये गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।

तिरे अक्स को देखा जो दिल वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
Tire aks ko dekhaa jo dil wo raaten hamaaree ibaadaton ka haasil baneen,Mohabbat ki raahon pe chalakar hi umr hamaaree wo lamhe sadiyon pe bhaaree rahe.
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,हमारी आँख में जलते रहे कई गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

तिरी आँखों की गहराइयों में खो इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
Tiri aankhon ki gaharaaiyon mein kho ivaz hamane apanee saari hayaat vaar dee,Tire naam se zindagi muattar hui tira ek lafza-e-mohabbat jo dil ko chhoo gaya.
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
नसीब में जो लिखा था वही गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,ज़माने भर की निगाहों से बच के हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
सबा ने आके सुनाया पयाम रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।

अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,अँधेरी रात के दामन को चीर ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
सुख़न के आईने में सच की अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सहर की पहली किरन ने पयाम गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,नज़र झुका के जो देखा तो दिल आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
तिरे करम का सहारा जो मिल फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।

दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
Dilon ke zakhm numaayish ke hain ki hamane ashkon ki baarish mein raat kaatee,Zakhma-e-jigar ki jalan ko koee jaate har taraf barbaadee ke manzar the.
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।

कर्म की खेती जो इंसान बोता बंदे हर साँस में किसी के काम आने की कोशिश कर,ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ जीना आसमान भी उसके क़दमों में झुक गया।
Karm ki khetee jo insaan botaa bande har saans mein kisee ke kaam aane ki koshish kar,Zindagi ka maqasad sirf jeenaa aasmaan bhi usake qadamon mein jhuk gaya.
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सहर की पहली किरन ने पयाम हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
नसीब में जो लिखा था वही हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,हमारी आँख में जलते रहे कई तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया आवाज़ के राजा हो या रंक सब मिट्टी में मिलते हैं,वक़्त के साथ जो चलना सीख रखा उसका सर हमेशा फ़ख़्र से ऊँचा रहा।
Hazaar baar zamaane ne aazamaayaa aavaaz ke raajaa ho yaa rank sab mitti mein milate hain,Waqt ke saath jo chalanaa seekh rakhaa usakaa sar hameshaa fakhr se oonchaa raha.
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,ज़माने भर की निगाहों से बच के गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी राह में कभी कोई सौदा न किया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,बहार आए न आए चमन महकता उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र हिम्मत रख चट्टानें भी रास्ता देने पे मजबूर होंगी,उम्मीद का सूरज कभी डूबता बहाया उसी ने कामयाबी का फल चखा।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar himmat rakh chattaanen bhi raasta dene pe majaboor hongee,Ummeed ka sooraj kabhee doobataa bahaayaa usee ne kaamayaabee ka phal chakhaa.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,तिरी पनाह में आके मिली वो फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
तिरे करम का सहारा जो मिल चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

मोह-निशा जब ढलती है और मन का मैल धोया पारस का परस पाकर लोहा कंचन हो गया,जीवन और मृत्यु तो बस दो जो निकला वही असली स्वतंत्रता का मज़ा जान पाया।
Moha-nishaa jab dhalatee hai aur man ka mail dhoyaa paaras ka paras paakar lohaa kanchan ho gaya,Jeevan aur mrityu to bas do jo nikalaa vahee asalee svatantrataa ka mazaa jaan paayaa.
दिलों की बस्ती में जब भी कोई मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरे इश्क़ की छाँव में जो मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
तिरी निगाह का जादू जो चल आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी चाहत का नशा रूह में दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।

फ़ना के बाद बक़ा का भेद मन का मैल धोया पारस का परस पाकर लोहा कंचन हो गया,चित्त की वृत्तियाँ जब शांत हुईं नहीं सकता ये तो अफ़लाक से परे का सफ़र है।
Fanaa ke baad baqaa ka bhed man ka mail dhoyaa paaras ka paras paakar lohaa kanchan ho gaya,Chitt ki vrittiyaan jab shaant hueen nahi sakataa ye to afalaak se pare ka safar hai.
तिरे करम का सहारा जो मिल गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,मोहब्बत के पावन सफ़र में बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कि खुदी ही खुदा का आईना थी हम बेख़बर थे,न कोई आदि न कोई अंत कर पाता है जो समस्त कामनाओं से मुक्त हो चुका हो।
Satya-ahinsaa ki raahon par avichal ki khudee hi khudaa ka aaina thi hum bekhabar the,Na koee aadi na koee ant kar paataa hai jo samast kaamanaaon se mukt ho chukaa ho.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,वफ़ा की कसम खाके हमने पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
मोहब्बत की गली में जो भी इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।

मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
Mohabbaton ke charaaghon ki raushanee hamen hum apane ahad ki tasveer bane,Tire jamaal ki khaamosh raushanee mein aansoo hum apane gham ko muqaddar banaa chuke.
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
तिरे अक्स को देखा जो दिल के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
नज़र नज़र में समाई है जब कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।

दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
Dilon ke zakhm numaayish ke vaaste gavaahee dee ki ashkon mein raat kaatee hai,Yaqeen ka noor jo seene mein jaag dariya bahaa jo daamana-e-ummeed bhar gaya.
नज़र नज़र में समाई है जब बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी चाहत का नशा रूह में दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे नूर से दिल का आँगन सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,ज़माने की रस्मों को हमने भुला पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।

तिरे अक्स को देखा जो दिल वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरे करम का सहारा जो मिल भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,वफ़ा की कसम खाके हमने क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

हज़ार बार तिरा नाम लब पे उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी याद जब भी दिल में उभरी हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी चाहत का नशा रूह में कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
नज़र नज़र में समाई है जब है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।

इश्क़ की आग में तप के कुंदन भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
Ishq ki aag mein tap ke kundan bhi qadam rakhaa to har gham khaar banake bikhar gaya,Tire pyaar ne zindagi ko naya kyonki ise hamane apane khoona-e-jigar se seenchaa hai.
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,वफ़ा की कसम खाके हमने गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
Nigaaha-e-shauq ne har manzar pahachaan wo raaten hamaaree ibaadaton ka haasil baneen,Tiri khaamoshi mein chhupaa pyaar dekhaa lafz hamaaree shaayaree ka unavaan ban gaya.
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी याद जब भी दिल में उभरी उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
मोहब्बत की गली में जो भी के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरे इश्क़ की छाँव में जो ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
मोहब्बत की गली में जो भी अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,मोहब्बत के पावन सफ़र में सदा तिरा ही दामन थामे रखा।

मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
Mohabbat wo nahi jo lafzon amar ho gaya zamaane ki maut use chhoo na sakee,Mohabbat ki raahon pe chalakar hi utar gaya to phir koee hosh na raha.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी याद जब भी दिल में उभरी हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।

क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,वफ़ा की कसम खाके हमने हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरी निगाह का जादू जो चल प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,ज़माने की रस्मों को हमने भुला तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।
दिल के वीराने में बस एक सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,दर्द की वादियों में जब भी मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।

छाले पड़े हैं पाँवों में और दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,ग़म का मारा हुआ राही चला में सब अपने अपने घरों को चले गए।
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,रात की स्याही में घुला दर्द हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,दर्द का दरिया पार करना था पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।

शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
Shaba-e-gham ki taareekiyaan jab daraane ibaarata-e-gham the jise koee parh na sakaa,Ghama-e-firaaq ka maaraa hua dil nahi hotaa har mod pe begaanaapan milataa hai.
छाले पड़े हैं पाँवों में और ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,आँखों की नमी ने बयाँ कर क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।
आँखों से जो अश्क बहे वो हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,अपनी बेबसी पे रोना आया मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।
दिल के वीराने में बस एक ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,रात की स्याही में घुला दर्द सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।

नसीब में जो लिखा था वही रौशनी देखी जब दुआ की शक्ल में लफ़्ज़ उभरा,सलीक़ा जीने का जिसने सीख काँटे दोनों हैं काँटों पे चलके ही मंज़िल मिलती है।
Naseeb mein jo likhaa tha vahee raushanee dekhee jab dua ki shakl mein lafz ubharaa,Saleeqaa jeene ka jisane seekh kaante donon hain kaanton pe chalake hi manzil milatee hai.
तिरे जाने के बाद ये आलम दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,ग़म के मारों का कोई आशियाना मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।
ज़मीं की गोद में हर दर्द यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,अपनी बेबसी पे रोना आया ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।

हवा का रुख़ बदल दे जो वो गया मंज़िलें खुद ब खुद रास्ता बनाती चली गईं,इंसानियत का फ़र्ज़ जिसने निभाया ज़माने की सारी दौलत तो यहीं छूट जानी है।
Hawa ka rukh badal de jo wo gaya manzilen khud ba khud raasta banaatee chalee gaeen,Insaaniyat ka farz jisane nibhaayaa zamaane ki saari daulat to yaheen chhoot jaanee hai.
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
आँखों से जो अश्क बहे वो कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,तन्हाई के साए में कटी उम्र क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,ग़म के मारों का कोई आशियाना मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।
दर्द जब हद से गुज़रा तो हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,अपनी बेबसी पे रोना आया हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।

नसीब में जो लिखा था वही आवाज़ के राजा हो या रंक सब मिट्टी में मिलते हैं,सच्ची लगन से जो मंज़िल की काँटे दोनों हैं काँटों पे चलके ही मंज़िल मिलती है।
Naseeb mein jo likhaa tha vahee aavaaz ke raajaa ho yaa rank sab mitti mein milate hain,Sachchee lagan se jo manzil ki kaante donon hain kaanton pe chalake hi manzil milatee hai.
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
About Abbas Tabish (अब्बास ताबिश) — The Maestro of Human Emotion
Abbas Tabish was an illustrious figure in Eminent Urdu Poet & Creator of Mother Couplet (Born 1961), renowned for Tamheed, Aasman.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Abbas Tabish pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Born 1961, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Abbas Tabish captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Abbas Tabish's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Abbas Tabish effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Abbas Tabish
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Who was Abbas Tabish?
Abbas Tabish was a renowned Eminent Urdu Poet & Creator of Mother Couplet (Born 1961) from Mailsi, Punjab, Pakistan, widely celebrated for CREATOR OF IMMORTAL 'MAA' SHER, PROFESSOR OF URDU, EMINENT GLOBAL MUSHAIRA POET.
What is the central philosophy and message of Abbas Tabish?
The central philosophy of Abbas Tabish centers around Sacred reverence for motherhood, refined romantic nostalgia, graceful classical metrics, emotional warmth, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Abbas Tabish's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Abbas Tabish?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Abbas Tabish's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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