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निदा फ़ाज़ली की शायरी

1938 — 2016

परिचय

निदा फ़ाज़ली हिंदी-उर्दू के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। उनकी शायरी सरल भाषा में गहरी बातें कहती है जो आम आदमी के दिल को छूती है।

साहित्यिक योगदान

निदा फ़ाज़ली ने उर्दू शायरी को आम लोगों तक पहुँचाया। उनकी ग़ज़लें सरलता में गहराई का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने कई प्रसिद्ध फ़िल्मी गीत भी लिखे हैं।

निदा फ़ाज़ली की शायरी

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

निदा फ़ाज़ली

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

निदा फ़ाज़ली

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है

निदा फ़ाज़ली

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी में कोई किसी का नहीं बनता हम किसी के न सही अपने तो हैं

निदा फ़ाज़ली

ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी

निदा फ़ाज़ली

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

निदा फ़ाज़ली

आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है

निदा फ़ाज़ली

किसी भी शख्स की ख़ातिर बदल सकें खुद को ये मेरे बस की बात नहीं

निदा फ़ाज़ली

ज़मीन से ज़्यादा आसमान के तारों में ज़िंदगी ढूंढने वालों को सलाम करता हूँ

निदा फ़ाज़ली

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए

निदा फ़ाज़ली

ये ज़मीं अपनी नहीं आसमाँ अपना नहीं हम जहाँ तक भी गए एक मकाँ अपना नहीं

निदा फ़ाज़ली

हर एक चेहरे पे लिखी है अलग कहानी किसी को पढ़ने की फुरसत नहीं

निदा फ़ाज़ली

ख़ुदा ने आज तक उस कौम की हालत नहीं बदली न हो जिसको ख्याल खुद अपनी हालत के बदलने का

निदा फ़ाज़ली

वो जो शायरी में आग लगाते थे उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है

निदा फ़ाज़ली

अकेलापन मुझे अच्छा लगता है मगर कभी कभी किसी का साथ बहुत ज़रूरी हो जाता है

निदा फ़ाज़ली

हर रोज़ सुबह ये सोच के उठता हूँ कि आज का दिन कल से अच्छा होगा

निदा फ़ाज़ली

बहुत करीब थे हम एक-दूजे के मगर ज़माने ने बीच में दीवार खड़ी कर दी

निदा फ़ाज़ली

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया

निदा फ़ाज़ली

ये शहर बहुत बड़ा है मगर इसमें कोई अपना नहीं यहाँ भीड़ में भी तन्हाई है

निदा फ़ाज़ली

कुछ लोग ज़िंदगी जीते हैं कुछ लोग बस काट रहे हैं फ़र्क बस एहसास का है

निदा फ़ाज़ली

पत्ते गिर रहे हैं पेड़ से मगर पेड़ उदास नहीं उसे पता है नए आएंगे

निदा फ़ाज़ली

मैं कभी रोता नहीं लोगों के सामने मगर अकेले में — बहुत रोता हूँ

निदा फ़ाज़ली

जब से तुम गए हो घर की दीवारें भी ख़ामोश हो गई हैं

निदा फ़ाज़ली

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली

कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले

निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी में कोई बहुत ख़ास नहीं सब अपने-अपने वक़्त के मुसाफ़िर हैं

निदा फ़ाज़ली

फूल बोलो तो काँटे भी सुन लेंगे मगर काँटे बोलोगे तो फूल मुरझा जाएंगे

निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी एक सवाल है जवाब कोई नहीं देता बस चलते रहो आगे

निदा फ़ाज़ली

किसी की नज़र लग गई उस ख़ुशी को जो मेरे नसीब में लिखी थी

निदा फ़ाज़ली

वो जो कहते हैं ना कि वक़्त बड़ा बलवान है वक़्त बदलता है सब बदल जाता है

निदा फ़ाज़ली

बस यूँ ही चलता रहा मैं मंज़िल न कोई थी न कोई ठिकाना पर चलना ज़रूरी था

निदा फ़ाज़ली

दुनिया बदलो या ना बदलो मगर ख़ुद को बदलना ज़रूर सीखो

निदा फ़ाज़ली

हम जैसे चले थे वैसे ही लौट आए बस थोड़ा और उदास होकर

निदा फ़ाज़ली

कभी-कभी बहुत कम लफ़्ज़ों में बहुत बड़ी बात कह दी जाती है

निदा फ़ाज़ली

मैं अपने ग़म को शायरी बना देता हूँ ये मेरा इलाज भी है और ये मेरी इबादत भी

निदा फ़ाज़ली

लोग कहते हैं कि मैं बदल गया मैं कहता हूँ कि ज़माना बदल गया

निदा फ़ाज़ली

ग़ज़ल कहने का मौसम है चलो अपना ग़म बाँट लें कुछ तुम्हारा कुछ मेरा

निदा फ़ाज़ली

वो लोग बहुत याद आते हैं जो अब नहीं रहे पर उनकी यादें ज़िंदा हैं

निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी के सफ़र में कौन किसका साथी है सब अपनी राह चले जाते हैं

निदा फ़ाज़ली

एक चिराग़ जला कर रखो अंधेरे में वो काम आएगा उम्मीद का दीया बुझने न दो

निदा फ़ाज़ली

बातें बहुत सी थीं मगर मौका नहीं मिला जो कहना था वो अनकहा रह गया

निदा फ़ाज़ली

ज़िंदगी तुझसे कोई शिकवा नहीं बस ये कहना है कि थोड़ा और रुक जा

निदा फ़ाज़ली

नदी जैसे बहती रहो रुकोगे तो सड़ जाओगे चलते रहो आगे बढ़ते रहो

निदा फ़ाज़ली

जो बीत गया उसे भूल जाओ आगे बहुत कुछ है ज़िंदगी अभी बाक़ी है

निदा फ़ाज़ली

हर शाम को मैं तेरी याद में बैठ जाता हूँ चाय की प्याली और ग़ज़ल — बस यही मेरा संसार

निदा फ़ाज़ली

मैंने देखा है एक सपना कि सब लोग ख़ुश हैं पर ये सपना कभी पूरा नहीं हुआ

निदा फ़ाज़ली

छोटी-छोटी ख़ुशियाँ बटोरो बड़ी ख़ुशी का इंतज़ार मत करो वो कभी नहीं आती

निदा फ़ाज़ली

हर इंसान अकेला है भीड़ सिर्फ़ धोखा है असली ज़िंदगी अकेले ही बीतती है

निदा फ़ाज़ली

मैंने बहुत कुछ खोया है मगर जो बचा है उसकी कीमत अब समझता हूँ

निदा फ़ाज़ली