बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय
— कबीर
संत कबीरदास भारत के सबसे महान संत कवियों में से एक थे। उनके दोहे सरल भाषा में गहन आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश देते हैं जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
कबीर ने निर्गुण भक्ति की धारा को जन-जन तक पहुँचाया। उनके दोहे, साखियाँ और पद हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। बीजक उनकी प्रमुख रचना है। उन्होंने जाति-पाति, अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय
— कबीर
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
— कबीर
दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय
— कबीर
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय
— कबीर
साईं इतना दीजिए, जा में कुटुम समाय मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय
— कबीर
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय
— कबीर
तिनका कबहुँ न निंदिए, जो पाँवन तर होय कबहुँ उड़ आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय
— कबीर
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय
— कबीर
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय
— कबीर
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान
— कबीर
चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोय दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय
— कबीर
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर
— कबीर
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब पल में परलय होएगी, बहुरि करेगो कब
— कबीर
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय
— कबीर
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
— कबीर
जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ आप
— कबीर
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर
— कबीर
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर
— कबीर
दुबके को न दे बुझाय, चढ़े को न दे चढ़ाय दीन को न दीन जानिये, रहिमन बड़न बड़ाय
— कबीर
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं प्रेम गली अति सांकरी, ता में दो न समाहिं
— कबीर
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान
— कबीर
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप
— कबीर
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट
— कबीर
कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर जो पर पीर न जानही, सो काफ़िर बेपीर
— कबीर
जो तोको काँटा बुवे, ताहि बोय तू फूल तोहि फूल तो फूल है, वाको है तिरसूल
— कबीर
कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोए ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोए
— कबीर
सुख में सुमिरन ना किया, दुख में करते याद कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद
— कबीर
पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात देखत ही छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात
— कबीर
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत कहे कबीर गुरु पारसी, मन से पूरी प्रीत
— कबीर
कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस
— कबीर
मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग
— कबीर
जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय जैसा पानी पीजिए, तैसी बानी होय
— कबीर
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन माहिं ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं
— कबीर
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय
— कबीर
ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माहिं मूरख लोग न जानहीं, बाहर ढूंढन जाहिं
— कबीर
उठा बगुला प्रेम का, तिनका चढ़ा अकास तिनका-तिनका हो गया, तिन का तिनका पास
— कबीर
कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन
— कबीर
दोस पराए देखि करि, चला हसंत-हसंत अपने याद न आवहीं, जिनका आदि न अंत
— कबीर
कबीर रेख सिन्दूर की, काजल दिया न जाय नैनों रामही पूजिये, बर जाए तो जाय
— कबीर
गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट भीतर हाथ सहार दे, बाहर बाहे चोट
— कबीर
ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होय सुवरन कलश सुरा भरा, साधू निंदा सोय
— कबीर
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर
— कबीर
संत ना छाडे संतई, जो कोटिक मिलें असंत चंदन भुवंगम बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत
— कबीर
जाके मुँह माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप पुहुप बास तें पातरा, ऐसा तत्व अनूप
— कबीर
पतिवरता मैली भली, गले कांच की पोत सब सखियन में यों दिपे, ज्यों रवि ससि की जोत
— कबीर
कबीर तन पंछी भया, जहाँ मन तहाँ उडि जाइ जो जैसी संगति कर, सो तैसा ही फल पाइ
— कबीर
हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहिमाना आपस में दोउ लड़ि-लड़ि मुए, मरम न कोउ जाना
— कबीर
ज्ञानी मूल गँवाइया, आपन भये करता ताते संसारी भला, मन में रहे डरता
— कबीर
प्रेम न बारी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय राजा प्रजा जेहि रुचे, शीश देय ले जाय
— कबीर
कबीर कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाम गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउँ
— कबीर
सबसे हिलमिल चालिये, नदी नाव संजोग चलत-मिलत कब कट गया, दुरिया बहुत लोग
— कबीर
कागा काको धन हरे, कोयल काको देय मीठा शब्द सुनाय के, जग अपना कर लेय
— कबीर