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गुलज़ार की शायरी

1934 — वर्तमान

परिचय

संपूरन सिंह कालरा उर्फ़ गुलज़ार भारत के सबसे प्रतिष्ठित कवि, गीतकार और फ़िल्मकार हैं। उनकी कविता प्रकृति, प्रेम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सादगी में सुंदरता खोजती है।

साहित्यिक योगदान

गुलज़ार ने हिंदी कविता और फ़िल्मी गीतों को एक नया आयाम दिया। उनकी रचनाओं में सरलता और गहराई का अद्भुत संगम है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ऑस्कर और ग्रैमी अवार्ड मिल चुके हैं।

गुलज़ार साहब की शायरी

चाँद रात तुम्हें भी मुबारक चाँद भी तुम्हारे जैसा ही अकेला निकला है

गुलज़ार

आज फिर तुमपे प्यार आया है आज फिर दिल को तुमसे काम है

गुलज़ार

दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए

गुलज़ार

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं

गुलज़ार

कुछ तो बात है तुझमें कि लिखते लिखते थक जाती है कलम पर बात मुकम्मल नहीं होती

गुलज़ार

मुस्कुराहट वो अदा है जो बिना खर्च के मालामाल कर दे

गुलज़ार

ज़िंदगी ग़ैरों से कटती नहीं ये तो अपने ही मारे जाते हैं

गुलज़ार

वो हादसा जो ज़िंदगी बदल गया वो बस एक लम्हा था एक लम्हे में सब बदल गया

गुलज़ार

ये जो इश्क़ है ना ये बड़ा ज़ालिम है सबसे मीठा ज़हर है

गुलज़ार

मैंने कुछ ख्वाब सजाए थे उन ख्वाबों ने मुझे उजाड़ दिया

गुलज़ार

कोई भी मौसम हो कुछ लोग याद आते हैं बरसात में भी और धूप में भी

गुलज़ार

किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने मगर कोई चेहरा भी तुमने पढ़ा है

गुलज़ार

रिश्तों की बुनियाद इतनी मज़बूत रखो कि वक़्त भी उन्हें हिला न सके

गुलज़ार

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ये दिल की लगी अगर बुझ जाए तो क्या है

गुलज़ार

ज़िंदगी जीने के दो ही तरीके हैं एक जो हो रहा है होने दो दूसरा ज़िम्मेदारी उठाओ उसे बदलो

गुलज़ार

पत्ती पत्ती झड़ रही है ज़िंदगी जैसे कोई किताब है जो धीरे धीरे खत्म हो रही है

गुलज़ार

कुछ रिश्ते खामोशी से निभाए जाते हैं हर बात ज़ुबान से नहीं कही जाती

गुलज़ार

बारिशों में भीगना अच्छा लगता है जब कोई याद आता है तो आँखें भी भीग जाती हैं

गुलज़ार

मैं ने उसे देखा नहीं मगर सुना है कि चाँद जैसा कोई होता है

गुलज़ार

वो मिले थे ना किसी राह पे बस ऐसे गुज़र गए जैसे हवा गुज़रती है

गुलज़ार

मेरे हिस्से का सवेरा उसके ख्वाबों में गया मेरी नींद उसके जागने में काम आई

गुलज़ार

एक ख़ाली कमरा रख लेना मेरी यादों के लिए काफ़ी है

गुलज़ार

कितना अजीब लगता है कोई अपना ही अजनबी बन जाए

गुलज़ार

मोम के दिये जला कर रख दिए थे रास्ते पे पर हवाएँ बेईमान निकलीं

गुलज़ार

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

गुलज़ार

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

गुलज़ार

नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे

गुलज़ार

जब भी कोई आँख भीगी है मुझे अपने बचपन की बारिश याद आती है

गुलज़ार

ख़ुशबू तेरे बदन की उड़ती रही यहाँ जब तक हवा रही मेरे कमरे में आती रही

गुलज़ार

कुछ पल का ये साथ है ज़िंदगी लम्बी नहीं जो भी करना है अभी कर लो

गुलज़ार

मेरी सारी ज़िंदगी बस यूँ ही गुज़र गई मैं राह देखता रहा कोई मिला नहीं

गुलज़ार

चाँदनी दूर से आई है बहुत दूर से थक गई है अभी इसको कहीं ठहरने दो

गुलज़ार

कभी-कभी रात को वो तारे बुला लेते हैं जो गिरे थे मेरी आँखों से तेरी बज़्म में

गुलज़ार

ज़ख़्मों को ज़ख़्म रहने दो उन पे मरहम न लगाओ ये निशान काम आएंगे

गुलज़ार

कितने वरक़ उलट दिए ज़िंदगी की किताब के कोई भी सफ़हा ऐसा न मिला जिस पे ग़म न लिखा हो

गुलज़ार

दिल पे पत्थर रख के रोना सबको आता नहीं ये वो हुनर है जो सीखना पड़ता है

गुलज़ार

हमने तो बहुत सोचा था उन रास्तों को पर वो सारे रास्ते तेरी तरफ़ जाते थे

गुलज़ार

कोई हथेली पर रखो तो आँसू जेब में डालो तो मोती

गुलज़ार

दुनिया में बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो बिना कहे समझ जाएं

गुलज़ार

मैंने देखा है कि कुछ लोग हँसते-हँसते रोने लगते हैं ये वो लोग हैं जो बहुत अकेले हैं

गुलज़ार

मैं ख़ुद से भागा हूँ बहुत पर मेरा ही साया मुझसे बड़ा है

गुलज़ार

फूल खिलते हैं तो सोचता हूँ ये किसकी याद में खिले हैं

गुलज़ार

सारी दुनिया से थक कर जब मैं अपने पास लौटा मैं वहाँ भी नहीं था

गुलज़ार

किसी को अपना बनाने की कोशिश में हम खुद को खो बैठे

गुलज़ार

हमने भी बहुत याद किया पर कुछ यादें चुभती हैं तो कुछ सहलाती हैं

गुलज़ार

वो जो शायरी लिखी है तुमने उसमें मेरा हिस्सा भी है तुमने लिखा मैंने जिया

गुलज़ार

जब-जब मैंने सुकून ढूंढा वो मेरे पास था मैंने बाहर क्यों ढूंढा

गुलज़ार

वक़्त बहुत कम है बहुत कुछ कहना है पर तुम सुनते कहाँ हो

गुलज़ार

पतझड़ में एक पत्ता गिरता है तो पूरे पेड़ को दर्द होता है रिश्ते ऐसे ही होते हैं

गुलज़ार

अकेलापन बुरा नहीं है बस उसे ओढ़ना आना चाहिए

गुलज़ार